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________________ २०४ ] तिलोयपत्ती [ गाथा : १७६-१७८ अर्थ:-धूमप्रभाके इन्द्रक बिलोंका अन्तराल चार हजार चार सौ निन्यानबै योजन और पाँचसौ दण्ड प्रमाण है ॥१७५।। २०००० - २०००)x४–(३४५) =४४६ विशेषार्थ :-( २००००-- योजन अथवा ४४६६ (५-१)४४ योजन ५०० धनुष अन्तराल है । पांचवीं और छटी पृथिवीके इन्द्रकोंका परस्थान अन्तराल चोइस-सहस्स-जोयण-परिहीणो होदि केवलो रज्जू । तिमिसिदयस्स हिम-इंदयस्स दोण्हं पि विच्चालं ॥१७६॥ छ । रिए । जो १४००० । अर्थ : - पाँचवीं पृथिवीके अन्तिम इन्द्रक तिमिस्र और छठी पृथिवीके प्रथम इन्द्रक हिम, इन दोनों बिलोंका अन्तराल चौदह हजार योजन कम एक राजू अर्थात् १ राजू – १४००० योजन प्रमाण है ।।१७६।। छठी पृथिबीके इन्द्रकोंका स्वस्थान अन्तराल अट्ठाणउदी णव-सय-छ-सहस्सा 'जोयणाणि मघवीए। पणवण्ण-सयाणि धणू पत्तक्कं इंदयाण विच्चालं ।।१७७॥ जो ६६६८ । दंड ५५०० । अर्थ : मघवी पृथिवीमें प्रत्येक इन्द्रकका अन्तराल छह हजार नौ सौ अट्ठानबै योजन और पाँच हजार पाँच सौ धनुष है ॥१७७॥ ... मिला:.. ( १६००० - २००१) ४४-४३)= ६६६८९ योजन अथवा (३-१)x४ ६९९८ योजन ५५०० धनुष अन्तराल है । छठी और सातवीं पृथिवीके इन्द्रकोंका परस्थान अन्तराल 'छद्रुम-खिदि-चरिमिवय-प्रवहिट्ठाणाण होइ विच्चालं । एक्को रज्जू ऊणो जोयण-ति-सहस्स-कोस-जुगलेहिं ॥१७॥ । रिण । जो ३००० । को २ । १. द. ब. क. ज. ठ. जोयणादि । २. द. छठ्ठम ।
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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