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________________ २०२ ] तिलोयपण्णत्ती [ गाथा : १५०-१७२ विशेषार्थ:-दूसरी पृ० के इन्द्रक बिलौका अन्तराल ---- (३२००० -२०००)x४-(३४११) -RRE४ योजन अथवा २६.६६ यो० और (११ -१)४४ ४७०० धनुष है। दूसरी और तीसरी पृथिवीके इन्द्रक-बिलोंका परस्थान अन्तराल 'एक्को हबेदि रज्जू छब्बीस-सहस्स-जोयण-विहीणा । थललोलुगस्स तत्तिवपस्स दोण्हं पि विच्चालं ॥१७०॥ । रिण । यो २६००० । प्रर्थ :-वंशा पृथिवीके अन्तिम स्तनलोलुक इन्द्रकसे मेघा पृथिवीके प्रथम तप्तका अर्थात् दोनों इन्द्रक बिलोंका अन्तराल छब्बीस हजार योजन कम एक राजू अर्थात् १ राजू -- २६००० योजन प्रमाण है ।।१७०।। नीपरी पृथिवीके इन्टकोंका स्वस्थान अन्तग़ल तिष्णि सहस्सा दु-सया जोयरण-उणवण्ण तविय-पुढवीए। पणतीस-सय-वणि पत्तेक्कं इंक्याण विचालं ॥१७१।। यो ३२४१ । दंड ३५०० । अर्थ :-तीसरी पृथिवीके प्रत्येक इन्द्रक बिलका अन्तराल तीन हजार दो सौ उनचास योजन और तीन हजार पाँचसौ धनुष प्रमाण है ।।१७१॥ विशेषार्थ :-( २८००० - २०० २८००० -- २०००)x४- (२४६) ३२४९१ योजन । अथवा ३२४६ योजन ३५०० धनुष प्रमाण अन्तराल है। तीसरी और चौथी पृथिवीके इन्द्रकोंका परस्थान अन्तराल . : एक्को हवेवि रज्जू बावीस-सहस्स-जोयण-विहीणा । दोण्हं विच्चालमिणं संपज्जलिदार णामारणं ॥१७२॥ रिण ! जो २२००० । १. ब. क. ज. ठ. एक्का । २. द. ब. के. ज. 3. धणलोलगस्स ।
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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