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________________ १६० ] तिलोयपण्णत्ती [ गाथा : १४७ - १४९ अर्थ :- चौथी भूमिमें खाड नामक छठे इन्द्रके विस्तारका प्रमाण, दस लाख, सोलह हजार बहस छ्यास योजन और एक योजनके तीन भागों से दो-भाग प्रमाण है ।। १४६ ।। ९१६६६६= १०१६६६६ योजन विस्तार वाद नामक विशेषार्थ :- ११०८३३३३ छठे इन्द्रक बिलका है । पणवीस - सहस्साधिय-णव- जोयण - सय सहस्स परिमाणा । तुरिमाए खोणीए खडखड - णामस्स वित्थारो ६२५००० | अर्थ :- चौथी पृथिवीमें खलखल ( खडखड ) नामक सातवें इन्द्रकका विस्तार नौ लाख, पच्चीस हजार योजन प्रमाण है ।।१४७।। विशेषार्थ :- १०१६६६६ नामक सातवें इन्द्रक बिलका है । 1128011 ६१६६६५ – ६२५००० योजन प्रमाण विस्तार खलखल पांचवीं पृथिवीके पाँच इन्द्रकोंका पृथक्-पृथक् विस्तार लक्खाणि प्रट्ठ- जोयण-तेत्तीस - सहस्स-लि-सय-तेत्तीसा | एक्क-कला 'तम - इंदय - वित्थारो पंचम- धराए ।। १४८ ॥ ८३३३३३३ | अर्थ :- पाँचवीं पृथिवीमें तम नामक प्रथम इन्द्रकका विस्तार बाठ लाख, तैंतीस हजार, तीनसौ तेतीस योजन और एक योजनके तीसरे भाग प्रमाण है ।। १४८ सग जोयण - लक्खा दोणि कला विशेषार्थ :- ६२५००० - ६१६६६६३३३३३३ योजन विस्तार पांचवीं पृ० के तम नामक प्रथम इन्द्रक बिलका है । इगिदाल सहस्त-छ-सय-छासट्ठी । भम - इ बय-रुंदी पंचम धरित्तीए ॥१४६॥ ७४१६६६ । अर्थ :- पांचवीं पृथिवीमें भ्रम नामक द्वितीय इन्द्रकका विस्तार सात लाख, इकतालीस हजार छह सौ छ्यासठ योजन और एक योजनके तीन भागोंमेंसे दो भाग प्रमाण है ||१४|| १. द. तमयं इंदय ।
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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