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________________ १८४ ] तिलोयपण्णत्ती [ गाथा : १२७-१२६ अर्थ :--दूसरी पृथिवीमें संघात नामक छठे इन्द्रकका विस्तार अट्ठाईस लाख पचास हजार योजन प्रमाण है ॥ १२६॥ विशेषार्थ :- २९४१६६६३ - ६१६६६ = २८५०००० योजन विस्तार संघात नामक छठे इन्द्रक बिलका है । सत्तावीसं लक्खा अडवण्ण- सहस्स-ति-सय-तेत्तीसा । एक्क-कला ति विहसा 'जिभिदय-रुंद परिमाणं ।। १२७ ।। २७५८३३३३ । अर्थ :- जिह्न नामक सातवें इन्द्रक के विस्तारका प्रमाण सत्ताईस लाख, अट्ठावन हजार, तीनस तैंतीस योजन और एक योजनके तीसरे भाग प्रमाण है ।।१२७/ विशेषार्थ :- २८५०००० - ε१६६६३-२७५८३३३३ योजन विस्तार जिल्ह्न नामक सातवें इन्द्रक बिलका है । छब्बीसं लक्खाणि छासट्ठि सहस्स छ-सय-छासट्ठि' । दोणि कला ति-विहत्ता जिन्भग-स्पामस्स वित्थारो ॥ १२८ ॥ २६६६६६६ । अर्थ :- जिल्ह्वक नामक आठवें इन्द्रकका विस्तार छब्बीस लाख, छ्यासठ हजार, हसी छयासठ योजन और एक योजनके तीन भागों में से दो भाग प्रमाण है ।। १२८ ।। विशेषार्थ :- - २७५८३३३९ - ९१६६६३ = २६६६६६६३ योजन विस्तार जिल्ह्नक नामक आठवें इन्द्रक बिलका है । पणुवीसं लक्खाणि जोयराया पंचहतरि सहस्सा । लोलियस रुदो बिदियाए होदि पुढवीए ॥ १२६ ॥ २५७५००० । अर्थ :-दूसरी पृथिवी में नये लोल इन्द्रकका विस्तार पच्चीस लाख पचहत्तर हजार योजन प्रमाण है ।। १२६ । १. द. ब. दिमिंदय । २. दाद्र ।
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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