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________________ गाथा : १२३-१२६ ] विदुनो महाहियारो [ १८३ इमितीनं नागि गुती नाहस्स-जोयणाणि पि । मण-इवयस्स रुंदं गादध्वं विदिय-पुढवीए ॥१२३।। ३१२५०००। अर्थ :--दूसरी पृथिवीमें मन नामक तृतीय इन्द्रकका विस्तार इकतीस लाख, पच्चीस हजार योजन प्रमाण जानना चाहिए ।।१२३॥ विशेषार्थ :-३२१६६६६३ - ६१६६६१३१२५००० योजन विस्तार मन नामक तृतीय इन्द्र क बिल का है। तीसं विय लक्खारिग तेत्तीस-सहस्स-ति-सथ-तेत्तीसा । एक्क-कला बिदियाए वण-इंदय-रद-परिमाणं ॥१२४॥ ३०३३३३३ । अर्थ :-दूसरी पृथिवीमें वन नामक चतुर्थ इन्द्रकके विस्तारका प्रमाण तीस लाख, तेंतीस हजार तीन-सी तैतीस योजन और योजनका एक-तिहाई भाग है ।।१२४॥ विशेषार्थ :–३१२५००० - ६१६६६३३०३३३३३३ योजन विस्तार वन नामक चतुर्थ इन्द्रक बिलका है। एक्कोण-तीस-लषखा इगिदाल-सहस्स-छ-सय-छासट्ठी । दोणि कला ति-विहत्ता धादिदय-णाम-वित्थारो ।।१२।। २६४१६६६३। अर्थ :-घात नामक पंचम इन्द्रकका बिस्तार योजनके तीन-भागोंमेसे दो भाग सहित उनतीस लाख, इकतालीस हजार, छहसौ छयासठ योजन प्रमाण है ।।१२।। विशेषार्थ :-३०३३३३३३ – ११६६६३=२६४१६६६३ योजन बिस्तार घात नामक पंचम इंद्रक बिलका है। अट्ठावीसं लक्खा 'पण्णास-सहस्स-जोयाणि पि । संघात-रणाम-इंदय-वित्थारो बिदिय-पुढयोए ॥१२६॥ २०५००००। १.द. लक्खाणं पूणवीसं। २. द.ब. क. पण्णारस ।
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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