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________________ गाथा : १०१-१०३ ] विदुनो महाहियारो [ १७५ मर्थ :-नारकियोंके संख्यात योजन विस्तार वाले बिलोंमें तिरछे रूपमें जघन्य अन्तराल छह कोस प्रमाण और उत्कृष्ट अन्तराल इससे दुगुना अर्थात् बारह कोस प्रमाण है ।।१००। विशेषार्थ :-संख्यात योजन विस्तार वाले नरकबिलोंका जघन्य तिर्यग् अन्तर छह कोस (१३ योजन ) और उत्कृष्ट तिर्यग् अन्तर १२ कोस ( ३ योजन ) प्रमाण है। रिणरय-बिलाणं होदि हु असंख-रु'दाग प्रवर-विच्चालं । जोयण-सत्त-सहस्सं उक्करसे तं असंखेज्जं ॥१०॥ जो० ७००० । रि। अर्थ:-नारकियोंके असंख्यात योजन विस्तारवाले बिलोंका जघन्य अन्तराल सात हजार योजन और उत्कृष्ट अन्तराल असंख्यात योजन ही है ।।१०१।। विशेषार्थ :-असंख्यात योजन विस्तारवाले नरक बिलोंका अमान्य तिय अन्तर ७००० योजन और उत्कृष्ट तिर्यग् अन्तर असंख्यात योजन प्रमाण है । संदृष्टिमें असंख्यातका चिह्न 'रि' ग्रहण किया गया है। प्रकीर्णक बिलोंमें संख्यात एवं असंख्यात योजन विस्तृत बिलोंका विभाग उत्त-पइण्णय-मज्झे होंति हु 'बहवो' असंख-वित्थारा । संखेज्ज-वास-जुत्ता थोवा 'होर-तिमिर-संजुत्ता ॥१०२१॥ अर्थ : पूर्वोक्त प्रकीर्णक बिलोंमें-प्रसंख्यात योजन विस्तारवाले बिल बहुत है और संख्यात योजन विस्तारवाले बिल थोड़े हैं । ये सब बिल घोर अंधकारसे व्याप्त रहते हैं ॥१०२॥ सग-सग-पुढवि-गयाणं संखासंखेज्ज-हद-रासिम्मि । इंदय-सेटि-विहीणे कमसो सेसा पइण्णए उभयं ॥१०॥ ५६६६८७ । प्र. २३६५५८०५। एवं पुढवि पडि पाणेदव्वं । अर्थ :-अपनी-अपनी पृथिवीके संख्यात योजन विस्तारवाले बिलोंकी राशिमेंसे इन्द्रक बिलोंका प्रमाण-घटा देनेपर-संख्यात योजन विस्तारवाले प्रकीर्णक बिलोंका प्रमाण शेष रहता है । ४. च. होएति १. क. ए. बहुवो। २. द. ब. क. वित्थारो। ठ. वित्थारे। ३. क. होराति। तिमिर । ५. क. 8. २३९५६८० ।
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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