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________________ गाथा : ६७ ] विदुओ महाहियारो अर्थ:-सम्पूर्ण बिलसंख्याके पाँच भागोंमेंसे एक भाग (1) प्रमाण बिलोंका विस्तार संख्यात योजन और शेष चारभाग (३ ) प्रमाण बिलोंका विस्तार असंख्यात योजन है १९६।। विशेषार्य :-सातों पृथिवियोंके समस्त बिलोंका प्रमाण ८४००००० है। इसका भाग अर्थात् ८४००००० =१६८०००० बिल संख्यात योजन प्रमाण वाले और ८४०००००४= ६७२०००० दिल असंख्यात योजन प्रमाण वाले हैं । रत्नप्रभादिक पणिदिरों में संख्या एवं प्रसंगार गोजा विस्तार वाले बिलोंका पृथक्-पृथक् प्रमाण छ-पंच-ति-युग-लक्खा सट्रि-सहस्साणि तह य एक्कोणा। वीस-सहस्सा एक्क 'रयणादिसु संख-वित्थारा ॥६॥ ६००००० 1 ५००००० । ३००००० । २०००००। ६०००० 1 १६६६६।१। पर्म :-रत्नप्रभादिक पृथिवियोंमें क्रमशः छह लाख, पाँच लाख, तीन लाख, दो लाख, साठ हजार, एक कम बीस हजार और एक, इतने बिलोंका विस्तार संख्यात योजन प्रमाण है ॥१७॥ विशेषार्थ :-रत्नप्रभादिक प्रत्येक पृथिवीके सम्पूर्ण बिलोंके 1 वें भाग प्रमाण बिल संख्यात योजन विस्तार वाले हैं । यथा पहली पृ० में–३०००००० का = ६००००० बिल संख्यात यो० विस्तार वाले। दूसरी पृ० में–२५००००० का -५००००० तीसरी , -१५००००० का -३००००० , , , चौथी , –१०००००० का=२००००० पाँचवीं , –३००००० का =६०००० छठी , –९९९९५ का ३= १९९९९ सातवीं ,, –५ का १. ६. व. क. ठ. ट्टयणे दिसु ।
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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