SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 248
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ गाथा : ६३-६४ ] वियुप्रो महाहियारो [ १७१ महासटो-हीणं लक्खं छट्ठीए' मेदिणीए वि । प्रवणीए सत्तमिए पइपया णस्थि णियमेणं ॥३॥ ६६६३२ । अर्थ :-छठी पृथिवीमें अड़सठ कम एक लाख प्रकीर्णक बिल हैं। सातवीं पृथिवीमें नियममे प्रकीर्णक बिल नहीं हैं ॥३॥ विशेषार्थ :-छठी पृथिवीमें कुल बिल REEE५ हैं, इनमेंसे तीन इन्द्रक और ६० श्रेणीबद्ध बिल घटा देनेपर प्रकीर्णक बिलोंकी संख्या ६६६३२ प्राप्त होती है । सप्तम पृथिवीमें एक इन्द्रक और चारों दिशानोंमें एक-एक श्रेणीबद्ध, इसप्रकार कुल पांच ही बिल हैं। प्रकीर्णक बिल वहाँ नहीं हैं। छह-पृथिवियोंके समस्त प्रकीर्णक बिलोंकी संख्या तेसीदि लक्खाणि उदि-सहस्साणि ति-सय-सगवालं । छप्पुढवीणं मिलिदा सब्वे वि पइण्णया होंति ॥१४॥ ८३६०३४७। अर्थ:-छह पृथिवियोंक सभी प्रकीर्णक बिलोंका योग तेरासी लाख, नव्यै हजार तीनसौ सैंतालीस है ।।६४॥ [ विशेषार्थ अगले पृष्ठ पर देखिये ] १. द. छट्ठी, ब. क. छट्ठी ।
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy