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________________ १६४] तिलोयपणती [ गाथा : ७८-७९ (११२४८) + (११४२४२०४) -(८x११) _ ५३६८ - २६८४ दूसरी पृथिवीगत श्रेणीबद्ध बिलोंका कुल प्रमाण । यहाँ गाथा ॥७६॥ के निम्न सूत्रका प्रयोग हुआ है :संकलित धन= [ (पद)२ x चय+ ( २ पद मुख)–पद X चय ] x : चोद्दस-सयारिण छाहत्तरीय तवियाए तह य सत्त-सया । तुरिमाए सट्ठि-जुदं दु-सयारिण पंचमीए' थि ।।७।। १४७६ । ७०० १ २६० । प्रर्थ:-तीसरी पृथिवीमें चौदहसौ छयत्तर, चौथीमें सातसौ और पाँचवों पृथिवीमें दोसौ साठ श्रेणीबद्ध बिल हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥७॥ विशेषार्थ :- (९२४८) + (९४२४१३२) -- (८४६) = २९५२ = १४७६ तीसरी पृथिवीज कोशीबद्ध निझोंका मुल प्रमा। (७२४८) + (७४२४७६), (८४७) = १४०० = ७०० चौथो पृथिवीगत श्रेणीबद्ध बिलोंका कुल प्रमाण । __{५२४८ ) + { ५५२४३६ ) (८४५) = ५२० - २६० पाँचवीं पृथिवीगत श्रेणीबद्ध बिलोंका कुल प्रमाण । सट्ठी तमप्पहाए चरिम-धरित्तीए होति यत्तारि । एवं सेढीबद्धा पत्तेक्कं सत्त-खोणीसु ॥७॥ ६०1४। अर्थ : तमःप्रभा पृथिवीमें साठ और अन्तिम महातमःप्रभा पृथिवीमें चार श्रेणीबद्ध बिल हैं । इसप्रकार सात पृथिवियों से प्रत्येकमें श्रेणीबद्ध बिलोंका प्रमाण समझना चाहिए ॥७॥ ------- - - १. द. ब. क. पंचमिए होदि पायम्यं । उ. पंचमिए होदि यादव। २. . वंतिरिए। ३. द.ब. क.. खोणीए ।
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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