SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 227
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ १५० ] तिलोयपण्णत्ती [ गाथा : ३८ १३ । ११ । ६।७।५ । ३।१। अर्थ :-रत्नप्रभा आदिक पृथिवियों में क्रमश: तेरह, ग्यारह, नौ, सात, पाँच, तीन और एक, इसप्रकार कुल उनचास इन्द्रक बिल हैं ॥३७॥ विशेषार्थ :-प्रथम नरकमें १३, दूसरेमें ११, तीसरेमें ६, चौथेमें ७, पाँचवेंमें ५, छठेमें ३ और सातवें नरकमें एक इन्द्रक चिल है । एक-एक पटलमें एक-एक इन्द्रक बिल है, अतः पटलभी ४६ ही हैं। इन्द्रक बिलोंके आश्रित श्रेणीबद्ध विलोंकी संख्या पठमम्हि इंदयम्हि य दिसासु उणवण-सेढिबद्धा य । अडदालं विदिसासु विदियादिसु एक्क-परिहीणा ॥३८॥ अर्थ :-पहले इन्द्रक बिलकी आश्रित दिशाओं में उनचास और विदिशामोंमें अड़तालीस श्रेणीबद्ध बिल हैं । इसके आगे द्वितीयादि इन्द्रक बिलोंके प्राश्रित रहनेवाले श्रेणीबद्ध बिलोंमेंसे एकएक बिल कम होता गया है ॥३८॥ [ चित्र अगले पृष्ठ पर देखिये ]
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy