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________________ गाथा : २६६ ] पदमो महाहियारो [ १११ अर्थ :- इस दूष्यक्षेत्रके यव-क्षेत्रोंका घनफल चौदह से भाजित लोकप्रमाण है । अब यहाँ आगे अनुक्रमसे गिरटक खण्डका वर्णन करते हैं ||२६८ || विशेषार्थ :- इस दृष्यक्षेत्रकी बाहरी उभय भुजाओं अर्थात् क्षेत्र संख्या १ और २ का घनफल :- [ ( भूमि १ राजू + मुख ३ रा० = ३)×××¥×7 ]= १५७ घनराजू है । अभ्यन्तर उभय भुजाओं अर्थात् क्षेत्र संख्या ३ और ४ का घनफल [ ऊँचाई में भूमि ( *+मुख+ ) x ३ × ××३] = ४९ घनराजू है । डेढ़ यवों श्रर्थात् क्षेत्र संख्या ५ और ६ का धनफल [ ( भूमि १ रा० + मुख० ) x x x x ३] = धनराजू है । इसप्रकार सम्पूर्ण ३० + + + ____१४७+६८+४९_२६४ X - १४७ घनराजू दुष्यऊर्ध्वलोकका घनफल है | २ ८. गिरि-कटक ऊर्ध्वलोकका घनफल : भूमि ५ राजू, मुग़ १ राजू और रा पईदा गिरिकटककी रचना करके घनफल निकाला गया है । इसकी प्राकृति इसप्रकार है : :
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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