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________________ १०८ ] तिलोय पण्णत्ती सत्ताणउदी तिधिय णउदाश्रो । 'पंचुत्तर - एक्कस चरसीदो सेवा उदाल एक्कवीस गुरणगारा ।। २६३ ।। १४७ १०५ | १४७६७ । ४७९३ । ७६४ । ४७५३ । १४७४४ | १४७२१ ॥ अर्थ :- सातों स्थानों में ऊपर-ऊपर इक्कीससे विभक्त राजू रखकर उनमें विस्तारके निमित्तभूत गुणकार कहता हूं ||२६२ ।। अर्थ :---एकसी पांच सत्तानवे, तेरानवे, चौरासी, तिरेपन, चवालीस और इक्कीस उपर्युक्त सात स्थानों में ये सात गुणकार हैं ।। २६३ ।। 1 विशेषार्थ : - इस मन्दराकृतिक्षेत्रका भूमि विस्तार ५ राजू मुख विस्तार १ राजू और ऊँचाई ७ राजू है । भूमिमेंसे मुख घटा देनेपर ( ५- १ ) = ४ राजू हानि ७ राजू ऊँचाई पर होती है अर्थात् प्रत्येक एक-एक राजूकी ऊँचाईपर राजूकी हानि प्राप्त होती है । इस हानि-चयको अपनीअपनी ऊँचाईसे गुणित करनेपर हानिका प्रमाण प्राप्त हो जाता है । उस हानिको पूर्व-पूर्व विस्तारमेंसे घटा देनेपर ऊपर-ऊपरका विस्तार प्राप्त होता जाता है । यथा : तलभाग ५ राजू अर्थात् ६१५ राजू, राजूकी ऊँचाईपर राजू, राजूकी ऊँचाईपर राजू, राजू, राजूकी ऊँचाईपर राजू और १३ राजूकी ऊँचाईपर राजू विस्तार है । [ गाथा: २६३-२६६ = २०२ = ६५ ३४३ ६ ३४३ ६ उड्डुढं रज्जु-घणं सत्तसु ठासु ठविय हेट्ठादो । विदफल - जाणण दुजुदारिंग दुसर्याारिंग सत्तत्तालजुदारिण पण वदियधिय- चउदस-सयाणि साव इय हवंति गुरपगारा । हारा णव णव एक्कं बाहत्तरि इगि बिहत्तरी चउरो ॥ २६६ ॥ १. ज क ल ब पंचत्तं एक्कसयं । = २१ = ३४३१ | ३४३ = १४१५ = C ३४३ ७२ ३४३४ राजू, राजूकी ऊँचाईपर राजूकी ऊँचाईपर वोच्छं गुणगार-हाराणि ॥ २६४ ॥ पंचाणउदी य एक्कश्रीसं च । बादल - सयाणि एक्करसं ।।२६५।। ४२४७ | = ११ ७२ ३४३ १ |
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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