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________________ २१ निर्दिष्ट है । इय दिट्ठ' दिट्टिवादम्हि (१ / ६६), 'वास उदयं भणामो निस्संदं दिट्ठि-वादादो' (१/१४८ ) । यह उल्लेख दर्शाता है कि ग्रंथ का स्रोत दृष्टिवाद नामक अंग है । गौतम गणधर ने तीर्थंकर महावीर की दिव्यध्वनि सुनकर द्वादशांग रूप जिनवाणी की रचना की थी। इसमें दृष्टिवाद नामका बारहवाँ अंग अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और विशाल था। इस अंग के ५ भेद हैं १. परिकर्म, २. सूत्र, ३. प्रथमानुयोग, ४. पूर्वगत और ५. चूलिका । परिकर्म के भी ५ भेद हैं- १. व्याख्याप्रज्ञप्ति २. द्वीपसागरप्रज्ञप्ति, ३. जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति, ४. सूर्यप्रज्ञप्ति और ५. चन्द्रप्रज्ञप्ति । ये सब ग्रंथ आज लुप्त हैं । इनके आधार पर रचित ग्रंथ इनके प्रभाव की प्रांशिक पूर्ति अवश्य करते हैं । तिलोथपण्णत्ती ऐसा ही ग्रन्थ है, बाद के अनेक ग्रन्थ इसके आधार से बने प्रतीत होते हैं। डा० हीरालाल जैन के अनुसार " उसकी प्राचीनता के कारण यह प्रषं मागधी श्रुतांग ग्रंथों के साथ तुलनात्मक दृष्टि से अध्ययन करने योग्य है और अन्ततः भारतीय पुरातत्व, धर्म एवं भाषा के अध्येताओं के लिए इस ग्रंथ के विविध विषय और इसकी प्राकृत भाषा रोचकता से रहित नहीं है ।" सम्पूर्ण ग्रंथ को रचयिता आचार्य ने योजनापूर्वक नौ महाधिकारों में सँवारा है सामण्णजगसरूवं तम्मिठियं रणारयाणलोयं च । " भावरण* गरम् - तिरियाणं, तर जोइसिका ॥ सिद्धार्ण लोगो त्तिय, श्रहियारे पयद दिट्ठ एव भेए । तम्मि बिद्ध जीवे, पसिद्ध-वर वण्णणा-सहिए ॥ ८९ ॥ वोच्छामि सयलभेदे, भब्वजणारद-पसर-संजणणं । जिणमुहकमलविणिग्गिय तिलोयपष्पत्ति सामाए ॥ ९० ॥ - उपर्युक्त नौ महाधिकारों में अनेक अवान्तर अधिकार हैं। अधिकांश ग्रन्थ पद्यमय है किन्तु खण्ड भो आये हैं । प्रारम्भिक मंगलाचरण में पंचपरमेष्ठी का स्तवन हुआ है परन्तु सिद्धों का स्तवन पहले है, अरहन्तों का बाद में । फिर पहले महाधिकार के अन्त से प्रारम्भ कर प्रत्येक महाधिकार के आदि और अन्त में क्रमशः एक-एक तीर्थंकर को नमस्कार किया गया है और अर से वर्धमान तक तीर्थंकरों को अन्तिम महाधिकार के अन्त में नमस्कार किया गया है । इस ग्रंथ का पहली बार सम्पादन दो भागों में प्रो० हीरालाल जैन व प्रो. ए. एन. उपाध्ये द्वारा १९४३ व १६५१ में सम्पन्न हुआ था । पं० बालचन्द्रजी सिद्धान्त शास्त्री का मूलानुगामी हिन्दी अनुवाद भी इसमें है । इसका प्रकाशन जैन संस्कृति संरक्षक संघ, शोलापुर से जीवराज जैन ग्रंथमाला के प्रथम ग्रंथ के रूप में हुआ था। उस समय सम्पादकद्वय को उत्तर भारत की दो ही महत्त्वपूर्ण प्रतियां सुलभ हुई थी अत: इन्हींके आधार पर तथा अपनी तीक्ष्ण मेघा शक्ति के बल पर उन्होंने यह
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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