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________________ तिलोय पण्णत्ती [ गाथा : २१३ अर्थ :--शतारस्वर्ग तक उभय अर्थात् अभ्यन्तर और बाह्यक्षेत्रका मिश्र वनफल अट्टान से भाजित लोक के प्रमाण है। तथा इसके बाह्यक्षेत्रका घनफल घनराजूका अष्टमांश है ।।२११ ॥ ७० ] अर्थ :- उपर्युक्त उभय क्षेत्रके घनफलमेंसे बाह्यक्षेत्र के घनफलको घटा देनेपर जो शेष रहे उतना अभ्यन्तर क्षेत्रका धनफल होता है। वह साफ और सहभाजित धनराजूके प्रमारण है ।। २१२ ।। रु विशेषार्थ :- शतारस्वर्ग पर्यन्त श्री श्री ए ई ह से वेष्टित बाह्याभ्यन्तर क्षेत्र है। ऐ ई रेखा और ए ऐ रेखा राजू है अर्थात् ए ई रेखा (+3 ) है । प्रतिभुजा श्री ह रेखा का विस्तार राजू है, अतः + तथा ३३ × ७ = घनराजू उभय क्षेत्रोंका घनफल है, इसमें से श्री ए ऐ बाह्य त्रिकोणका घनफल xxx ७ = घनराजू घटा देनेपर श्री श्री ऐ ई ह अभ्यन्तर क्षेत्रका घनफल ( -६) == अर्थात् ३३ घनराजू प्राप्त होता हैं, जो २७ से गुणित और से भाजित धनराजू प्रमाण (१२७ = २७, तथा २७÷८ ३३ धनराजू ) है | 5 रज्जु-घरणा ठाणगे अड्ढा इज्जेहि वोहि गुणिदव्या । सव्यं मेलिय दु-गुखिय तस्सि ठावेज्ज जुत्ते ॥ २१३ ॥ अर्थ :- धनराजूको क्रमश: ढाई और दो से गुणा करनेपर जो गुरणनफल प्राप्त हो, उतना शेष दो स्थानोंके घनफलका प्रमाण है । इन सब घनफलोंको जोड़कर उसे दुगुनाकर संयुक्तरूप से रखना चाहिए || २१३॥ : विशेषार्थ :- प्रानतकल्पके ऊपर क्ष श्री ह त्र क्षेत्र हेतु (3 +3 ) = तथा घनफल - ३ ३ ७ घनराज प्रमाण है । X १. ज. ठ =\ ५ = २।≡ ७० ३४३ । २ । ३४३ ३४३ • །་ राजू प्रमाण है । इन सम्पूर्ण घनफलोंका योग इसप्रकार है- 三 ३४३ 1 | E ७० ३४३ धारण कल्पके उपरिम क्षेत्र अर्थात् ज्ञ क्ष त्र क्षेत्रका घनफल हुँ×××7 == २ घन ·‚àľ¦‚à°¦‚à°¦‹‚1⁄2“ = ३ ३४३ ३४३ ७० | द. = ५६ ३४३ = ३ ७० | | | | क. ३४३ ૩૪૨ ३४३ २३४३
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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