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________________ गाथा : २१४-२१५ ] पढमो महायिारो । ७१ 1+ + + + + + + + +:+1३६+२५ + ८३+२४+२४ + १६+६+१+२७ + २०+१६ =२८० धनराज त्रिभुज और चतुर्भुज क्षेत्र ऊर्ध्वलोकके दोनों पार्श्व भागोंमें हैं, अतः ३६ घनराजको दो से गुरिणत करनेपर ( २६४३) दोनों पार्श्वभागोंमें स्थित ग्यारह क्षेत्रोंका घनफल ७० धनराजू प्रमाण प्राप्त होता है। पाठ आयताकार क्षेत्रोंका और सनालीका घनफल एत्तो दल-रज्जूणं घण-रज्जूश्रो वंति अडवीसं । एक्कोणवरण-गुरिणदा मज्झिम-खेत्तम्मि रज्जु-घणा ॥२१४॥ |३०, २८१३३ अर्थ :-इसके अतिरिक्त दल ( अर्ध ) राजुनोंका घनफल अट्ठाईस धनराजू और मध्यमक्षेत्र ( असनाली ) का घनफल ४६ से गुरिणत एक धनराजू प्रमाण अर्थात् उनचास धनराजू प्रमाण है ।।२१४।। विशेषार्थ :-ग्यारह क्षेत्रोंके अतिरिक्त ऊर्ध्वलोकमें एक राजू चौड़े और अर्धराजू ऊँचे विस्तार वाले पाठ क्षेत्र हैं जिनका घनफल (२xixix ) =२८ घनराजू प्राप्त होता है । इसीप्रकार ऊर्ध्वलोक स्थित बसनालीका घनफल (१४७४७)=४६ धनराजू है । सम्पूर्ण ऊर्ध्वलोकका सम्मिलित घनफल 'पुन्व-वण्णिद-खिदीणं रज्जूए घणा सत्तरी होति । एदे तिणि वि रासी सत्तत्तालुत्तर-सयं मेलिवा ।।२१।। अर्थ :-पूर्वमें वरिणत इन पृथ्वियोंका घनफल सत्तर धनराजू प्रमाण होता है । इसप्रकार इन तीनों राशियोंका योग एकसौ सेंतालीस घनराज़ है, जो सम्पूर्ण ऊर्ध्वलोकका धनफल समझना चाहिए ।।२१५॥ १. द. ब. गृन्वरिणद। २. द. : ७८] = १४७
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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