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________________ ६६ ] तिलोय पण्णत्ती [ गाथा : २०३ २०५ पार्श्वभागों में इसप्रकार के चार त्रिभुज और चार ही चतुर्भुज हैं। इस गुणनफलमें असनालीका ( १४७ × ७ ) = ४६ घनराजू घनफल और मिला देनेपर सम्पूर्ण ऊर्ध्वलोकका घनफल प्राप्त हो जाता है । यथा -- + *='' x ४ = ६८ घनराजू आठ क्षेत्रोंका घनफल +४६ घनराजू त्रसनालीका घनफल = १४७ घनराजू सम्पूर्ण ऊर्ध्वलोकका घनफल प्राप्त होता है । यह घनफल तीन से गुणित और सातसे भाजित लोकप्रमाण मात्र है अर्थात् ३४३४३== १४७ घनराजू प्रमाण है । ऊर्ध्वलोकमें प्राठ क्षुद्र - भुजाओंका विस्तार एवं आकृति सोहम्मीसारोवार छ रूचेय 'रज्जूउ सत्त-पविभत्ता । खुल्लय-भुजस्स रुदं इगिपासे होदि लोयस्स ॥२०३॥ ४६ ६ । अर्थ :- सौधर्म और ईशान स्वर्गके ऊपर लोकके एक पार्श्वभाग में छोटी भुजाका विस्तार सातसे विभक्त छह ( 3 ) राजू प्रमाण है ।।२०३ || माहिद- उबरिमंते रज्जूम्रपंच होंति सत्त-हिंदा । "उणवण्ण-हिदा सेढी सत्त-गुणा बम्ह-परिधीए ॥ २०४ ॥ । ५ । ४७ । अर्थ :-- माहेन्द्रस्वर्गके ऊपर अन्त में सातसे भाजित पांच राजू और ब्रह्मस्वर्गके पास उनंचास से भाजित और सातसे गुणित जगच्छ पी प्रमाण छोटी भुजाका विस्तार है || २०४ || माहेन्द्र कल्प 3 राजू; ब्रह्मकल्प ज० श्रे० = ७ अर्थात् = = १ राजू । कापिट्ठ उवरिमंते रज्जूओ पंत्र होंति सप्त-हिदा । सुक्कस्स उयरिमंते सत्त-हिदा ति गुरिदो रज्जू ॥ २०५ ॥ । ४६५ ४ २ । अर्थ :- कापिष्ठ स्वर्गके ऊपर अन्तमें सालसे भाजित पाँच राजू, और शुक्र के ऊपर अन्त में सातसे भाजित और तीनसे गुणित राजू प्रमाण छोटी-भुजाका विस्तार है || २०५ || का० रा० ; शु० रा० । १. ६. छच्षेत्र रज्जुप्रो, । २. द. न. क. ज. ठ, मेत्तं । ३ द ज उपवण्ाहिदा रज्जु ।
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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