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________________ ४० ] तिलोयपण्णत्ती रत्नप्रभादि पृथिवियोंके गोत्र नाम धम्मा-सा मेघा जगरिद्वारा ' ओझ मधवीश्रो । माघविया इय ताणं पुढवीणं गोत्त-सामारि ॥। १५३ ।। [ गाथा : १५३ - १५६ अर्थ :-- धर्मा, वंशा, मेघा, अंजना, श्ररिष्टा, मघवी और माघवी, ये इन उपर्युक्त पृथिवियोंके गोत्र नाम हैं ।। १५३ ।। मध्यलोक के अधोभागसे लोकके अन्त - पर्यन्त राजू-विभाग मज्झिम- जगस्स हेट्टिम-भागादो णिग्गदो पढम- रज्जू । "सक्कर- पह- पुढवीए हेडिम भागम्म णिट्टादि ।। १५४।। ७ १ । अर्थ :- मध्यलोकके अधोभाग से प्रारम्भ होता हुआ पहला राजू शर्कराप्रभा पृथिवीके प्रभाग में समाप्त होता है ।। १५४ ।। ।। राजू १ ।। तत्तो 'दोइद- रज्जू बालुव-पह हेदुम्मि समयपेदि । तह य तइज्जा रज्जू "पंक- पहे हेट्टभायम्मि ।। १५५ ।। । ७२ । ७३ । अर्थ :- इसके आगे दूसरा राजु प्रारम्भ होकर बालुकाप्रभा के अधोभाग में समाप्त होता है, तथा तीसरा राजू पकप्रभाके अधोभागमें समाप्त होता है ।। ११५ ।। राजू २ । ३ । धूम - पहाए हेट्टिम - भागम्मि समप्पदे तुरिय-रज्जू । तह पंचमिश्रा रज्जू तमप्पहा - हेष्ट्ठिम-पएसे ॥ १५६ ॥ । उ ४ । छ ५ । अर्थ :- इसके अनन्तर चौथा राजू धूमप्रभाके अधोभागमें और पाँचवाँ राजू तमः प्रभाके भाग समाप्त होता है । १५६ । । १. क. रिट्ठाण उज्झ, ज. उ. द रिट्ठा भोज्झ । २. ब. गात 1 ३. द. ब. क. ठ. सक्करसेह | ज. सकरसेक । ४. ज. ठ. दुइज्ज, द. क. दोइज्ज । ५. ज. द. क. ठ. पंक पह हेटुस्स भागम्मि ।
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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