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________________ ३६ ] तिलोयपण्णत्ती तस्स य एक्कम्हि दए वासो पुग्वावरेण भूमि - मुहे । सत्तेक्क-पंच-एक्का रज्जूवो मज्झ-हाणि चयं ॥ १४४ ॥ [ गाथा : १४४-१४७ अर्थ :---. इस लोककी भूमि और मुखका व्यास पूर्व-पश्चिमकी अपेक्षा एक ओर क्रमशः सात, एक, पांच और एक राजूमात्र है, तथा मध्यमें हानि - वृद्धि है ।। १४४ ।। नोट :- गाथा १४१ से १४४ प्रकृत प्रसंगसे इतर है, क्योंकि गाथा १४० का सम्बन्ध गाथा १४५ - १४७ से है । सम्पूर्ण लोकको प्रनराकार रूप करनेका विधान एवं आकृति खे-संठिय-चखंडं सरिसद्वाणं 'आइ घेणं । तमोभय-पवखे विवरीय- कमेण मेलेज्जो ॥ १४५ ॥ 'एवज्जिय बसेसे खेल गहिऊण पवर- परिमाणं । पुषं पिव कादूणं बहलं बहलम्मि मेलेज्जो ॥१४६॥ एब-मबसेस -खेत जाव 'समध्येदि ताव घेत्तव्यं । एक्केक्क-पवर माणं एक्केषक - पदेस - बहलेणं अर्थ :- ग्राकाशमें स्थित, सदृश आकार वाले चारों-खण्डों को उभय पक्ष में विपरीत क्रमसे मिलाना चाहिए । इसीप्रकार अवशेष क्षेत्रों को ग्रहणकर और पूर्वके सदृश ही प्रतर प्रमाण करके बाहुल्यको बाहुल्यमें मिलायें । जब तक इस क्रमसे अवशिष्ट क्षेत्र समाप्त नहीं हो जाता, तब तक एक-एक प्रदेशकी मोटाईसे एक-एक प्रतर- प्रमाणको ग्रहण करना चाहिए ।। १४५ - १४७ ।। ।। १४७ ।। ग्रहणकर उन्हें विचारपूर्वक विशेषार्य :- १४ इंच ऊँची, ७ इंच मोटी और पूर्व-पश्चिम सात, एक, पांच और एक इंच चौड़ाई वाली मिट्टीकी एक लोकाकृति सामने रखकर उसमेंसे १४ इंच लम्बी, ७, १, ५, १ इंच चौड़ी और एक इंच मोटी एक परत छीलकर ऊँचाईकी श्रोरसे उसके दो भाग कर गाथा १४० में दर्शाई हुई ७ राजु उत्सेध और ७ राजू विस्तार वाली प्रतराकृतिके रूपमें बनाकर स्थापित करें | पुनः उस लोकाकृतिमेंसे एक इंच मोटी, १४ इंच ऊँची और पूर्व विस्तार वाली दूसरी परत छोलकर उसे भी प्रतर रूप करके पूर्व प्रतरके ऊपर स्थापित करें, पुनः इसी प्रमाण वाली तीसरी परत छीलकर उसे भी प्रतर रूप करके पूर्व स्थापित प्रतराकृतिके ऊपर ही स्थापित करें। इसप्रकार करते १. ब. मई । २. [ एवं यि ] | ५. द. व समं पेरि ।
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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