________________
गाथा : १४१-१४३ ]
पट्टमो महाहियारो
:..."
..
लोककी डेढ़ मृदंग सदृश प्राकृति बनाने का विधान मज्झम्हि पंच रज्जू कमसो हेट्रोवरम्हि' इगि-रज्जू । सग रज्जू उच्छेहो होदि जहा तह य छेत्तूणं ॥१४१॥ हेट्ठोवरिवं मेलिद-खेत्तायारं तु चरिम-लोयस्स । एदे पुटिवल्लस्स य खेतोवरि ठावए पयदं ॥१४२॥ 'उद्धिय-विवढ-मुरव-धजोयमाणो य तस्स आयारो।
एक्कपदे सग-अहलो चोइस-रज्जूदवो तस्स ॥१४३॥ प्रर्थ:-जिसप्रकार मध्य में पांच राज, नीचे और ऊपर क्रमशः एक राजू और ऊँचाई सात राजू हो, इसप्रकार खपित करनेपर नीचे और ऊपर मिले हुए क्षेत्रका प्राकार अन्तिम लोक अर्थात् ऊर्ध्वलोकका प्राकार होता है, इसको पूर्वोक्त क्षेत्र अर्थात् अधोलोकके ऊपर रखनेपर प्रकृति में खड़े किये हुए ध्वजयुक्त डेढ़मृदंगके सदृश उस सम्पूर्ण लोकका प्राकार होता है । इसको एकत्र करनेपर उस लोकका बाहल्य सात राजू और ऊंचाई चौदह राजू होती है ।।१४१-१४३।।
१. ६ क वरिम्हि । २. द. उम्भियदिवसरवद्ध। ३. द. ब सव्वहलो ।