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________________ ३२ ] तिलोयपणती लोकाकाश एवं लोकाकाश लोयायास- ट्ठाणं सयं- पहाणं स वन्य छवर्क हु । सबमलोयायासं तं सच्वास हवे गिना १३५॥ [ गाथा १३५-१३८ अर्थ : छह द्रव्योंसे सहित यह लोकाकाशका स्थान निश्चय ही स्वयंप्रधान है, इसकी सब दिशाओं में नियमसे प्रलोकाकाश स्थित है ।११३५|| लोकके भेद सयलो एस य लोश्रो रिप्पो सेढि विद- मारणेरणं तिaियप्पो णावव्वो हेट्ठिम-मज्झिल्ल उड्ड- मेएरा ॥ १३६ ॥ अर्थ :- श्रेणीवृन्दके मानसे श्रर्थात् जगच्छ्र गोके वनप्रमाणसे निष्पन्न हुआ यह सम्पूर्ण लोक अधोलोक, मध्यलोक और ऊर्ध्वलोकके भेदसे तीन प्रकारका जानना चाहिए || १३६ ॥ तीन लोककी प्राकृति हेट्ठिम लोयाश्रारो वेतासरण सहिो सहावेण । मज्झिम- लोयायारो उभय- मुरश्रद्ध-सारिच्छो ।। १३७ ।। Δ ए उबरिम- लोयाचारो उब्भिय मुरवेण होइ सरित्तो । संठारणो एवाणं लोयाणं एव्हि साहेमि ॥ १३८ ॥ अर्थ :-- इनमें से अधोलोककी आकृति स्वभावसे वेत्रासन सदृश और मध्यलोककी प्राकृति खड़े किए हुए अर्धमृदंग कर्वभागके सदृश है । ऊर्ध्वलोककी प्राकृति खड़े किए हुए मृदंगके सदृश है । अब इन तीनों लोकोंका श्राकार कहते हैं ।। १३७-१३८।१ १. ब. तं संवासं । २ द. तिब्वियप्पो ।
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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