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________________ सातवाँ अध्याय और परिभागमें आनेवाले पदाका परिमाण कर लेना उपभोगपरिभोगपरिमाण प्रत है। यापि उपभोगपरिमाणव्रतमें त्याग नियत काल के लिये ही किया जाता है. लेकिन मद्य मांस मधु फेतकी नीम के फूल अदरख मूद व अनतकार्यिकी विलिशाक मल आदि वनस्पतियोंका त्याग यावजीवन के लिये ही कर देना चाहिये क्योंकि इनके भक्षणमें फल तो थोड़ा होता है और जीवोंकी हिंसा अधिक होती है। इसी प्रकार यान वाहन आदिका त्याग भी यथाशक्ति कुछ कालके लिये या जीवन पर्यन्त करना चाहिये। संग्रमकी घिराधना किये बिना जो भोजनको जाता है वह अतिथि है। अथवा जिमके प्रतिपदा, द्वितीया आदि तिथि नहीं है, जो किसी भी तिथिमें भोजनको जाता है यह अतिथि है। इस प्रकारके अतिथिको विशिष्ट भाजन देना अतिथिसंविभागवत है। अतिथिसंविभाग के चार भेद है--- भिक्षादान, उपकरणदान, श्रीषधदान और आवासदान । मोक्षमार्गमें प्रयत्नशील, संयममें तत्पर और शुद्ध संयमीके लिये निर्मल चित्त से निर्दोष भिक्षा देनी चाहिये । इसी प्रकार पीछी,पुस्तकं, फमण्डलु आदि धर्मके उपकरण, योग्य औषधि और श्रद्धापूर्वक निवासस्थान भी देना चाहिये । 'च' 'शब्द' से यहाँ जिनेन्द्रदेवका अभिषेक, पूजन आदिका भी ग्रहण करना चाहिये । सामायिक, प्रोपोपवास, उपभोगपरिभोगपरिमाण और अतिथिसंविभाग ये चारों, जिस प्रकार माता-पिता के बचन सन्तानको शिक्षाप्रद होते हैं, उसी प्रकार आगुयतोंकी शिक्षा देनेवाले अर्थात् उसकी रक्षा करनेवाल होनेके कारण शिक्षावत कहलाते हैं। सल्लेखनाका वर्णन-. मारणान्तिकी सल्लेखनां जोषिता ॥ २२ ॥ मरणके अन्तमें होनेवाली सलंग्यनाको प्रीतिपूर्वक सेवन करनेवाला पुरुष गृहस्थ होता है। आयु. इन्द्रिय और बलका किसी कार से नाश हो जाना मरण है । इस प्रकारके मगणक समय गृहस्थको सल्लेखना करना चाहिये । समतापूर्वक कान और कषायों के कृश करनेको सल्लेखना कहते हैं। कायको कृश करना बाह्य सल्लेखना और कपायों का कृश करना अन्तरङ्ग सल टखना है। प्रश्न-अर्थकी स्पष्ताक लिये जापितांचे स्थानम सेविता' शब्द क्यों नहीं रखा ? उत्तर---अर्ध विशेषको बतलाने के लिय प्राचायन जोषिता शब्दका प्रयोग किया ट प्रीति पूर्वक सेवन करनेका नाम ही सल्लखना है। प्रीतिक बिना बलपूर्वक सल्लेखना नहीं कराई जाती है। किन्तु गृहस्थ संन्यासमें प्रीतिके होने पर स्वयं ही सल्लेखनाको करना है । अतः प्रीनिपूर्वक संबन अर्थ में जुषी धातुका प्रयोग बहुत उपयुक्त है। प्रश्न-स्वयं विचारपूर्वक प्राणों के त्याग करनेमें हिंसा होनेसे सल्लेखना करने पात्रको आत्मघातका दाप होगा? उत्तर---पहखमामें आत्मघातका दीप नहीं होता है क्योंकि प्रमत्तयोगस प्राणों के विनाश करनेको हिंसा कहते है और जो विचारपूर्वक सल्लेखनाको करता है, उसके राग दंपादिके न होनेसे प्रमत्त योग नहीं होता है। अतः सल्लेखना करने में आत्मघातका दाप संभव नहीं है। राग, द्वेष, मोह आदिसे संयुक्त जो पुरुष विष, शस्त्र, गलपाश, अग्निप्रवेश, कूपपतन आदि प्रयोगोंके द्वारा प्राणों का त्याग करता है वह आत्मघाती है। कहा भी है कि--
SR No.090502
Book TitleTattvarthvrutti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJinmati Mata
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages648
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size18 MB
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