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________________ ६७ ) तत्त्वार्थश्लोक वार्तिकालंकारे प्रभोपे शरीरताकारणमादेयनाम, निष्प्रभशरीरकाररण मनादेयतानाम, पुण्यगुणख्यानकारणं यशस्कीर्तिनाम यशोगुणविशेषः कीर्तिस्तस्य शब्दनमिति न तयोरनर्थान्तरत्वं । तत्प्रत्यनीकफलमयशस्कोर्तिनाम | प्रभा से सहित शरीर हो जाने का कारण आदेय नामकर्म है अर्थात् जिस कर्म के उदय से कान्ति, लावण्य, ओजस्वितायुक्त शरीर बने वह आदेय कर्म हैं, प्रभारहित शरीर को बनाने का हेतु अनादेय नामकर्म है। पुण्यवर्धक गुणों के प्रख्यापन करने का हेतु यशस्कीति नामकर्म है । यहाँ कोई शंका उठावे कि यशस् और कीर्ति शब्द का एक हो अर्थ है फिर सूत्रकार ने यशस्कीर्ति यह नाम क्यों रक्खा ? इसके उत्तर में आचार्य कहते हैं कि यश का अर्थ विशेष यानी असाधारण प्रकार के गुण हैं और कीर्ति शब्द का अर्थ कोर्तन करना है, तब तो उस स्वपरोपकारक गुण का जनता में सादर हर्ष प्रयुक्त कहे गये शब्दों द्वारा प्रख्यापन करना यशस्कीर्तिका अर्थ हुआ, इस कारण उन यशस् और कीर्ति शब्दों में अभेद नहीं है, किन्तु विभिन्न अर्थों का वाचकपना है । उस यशस्कीर्ति से सर्वथा विपरीत फल को उपजानेवाला अर्थात् जगत् में पापवर्धक दोषों का कीर्तन करानेवाला अयशस्कीति नामकर्म समझना चाहिये । आर्हत्यनिमित्तकारणं तीर्थंकरत्वं, गणधरत्वादीनामुपसंख्यानमिति चेन्न, अन्य - निमित्तत्वात् । गरणवरत्वस्य श्रुतज्ञानावरण वीर्यान्तरायक्षयोपशमप्रकर्षहेतुकत्वात् चक्रवर्तित्वादेरुच्चैर्गोत्रोदयनिमित्तकत्वात् । तदेव तीर्थंकरत्वस्यापीति चेत् न, तीर्थकरत्वस्य हि तन्निमितत्वे गरधरस्य तत्प्रसंगश्चक्रधरादेश्च न च तदस्ति ततोर्थांतरनिमित्तं यत्तदर्थान्तरं तत्तीर्थकरनामैव । घातिक्षयस्य मुँड (सामान्य) केवल्यादेरपि भावान्न तन्निबंधनं तस्य शंकनीयं, छत्रत्रयादि परमविभूतिफलस्य ततो संभवनिश्चयात् । समवसरण, देवागमन, आकाशयान, चौसठि चमर आदि बहिरंग विभूति और अनंत चतुष्टय, असंख्यात जीवों को मोक्षमार्ग में लगा देने की शक्ति, आदि अंतरंग अचिन्त्य विभूति करके सहित हो रहे अर्हन्तपने का निमित्तकारण तीर्थकरत्व नामक म है । यहाँ कोई शंका करता है कि जिसप्रकार महा-महिमा - अन्वित तीर्थंकरत्व नामकर्म को कहा गया है उसी प्रकार गणधरपन, विपुलमतिमनः पर्यायज्ञानीपन, सर्वावधिज्ञानीपन, परिहारविशुद्धिसंयम, चक्रवर्तीपन, नारायणत्व, प्रतिनारायगत्व, बलभद्रपन आदिकविशिष्ट संमृद्धि करा देने के कारण हो रहे नामकर्मों का भी अतिरिक्त निरूपण करना चाहिये । ग्रन्थकार कहते हैं कि यह तो न कहना, क्योंकि गणधरपन आदि होने के निमित्तकारण अन्य विद्यमान
SR No.090501
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 7
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1980
Total Pages498
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size15 MB
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