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________________ अष्टमोऽध्यायः ( ४७ औषधि खालेने पर ज्वरका आवरण हो जाता है । छत या डेरे के भीतर वृष्टिजल या घामका आवरण होरहा हैं । एक बात यह भी है कि जो कि कही जाचुकी है कि अभव्य आत्मासे सर्वथा भिन्न हो रहे उन मन:पर्ययज्ञान, केवलज्ञान का अभाव हैं अर्थात् अभव्य में कोई दो पर्यायें भिन्न पडी हुई नहीं हैं, जिनका कि आवरण दोनों कर्म करते रहें किन्तु दोनों आवरणों का सतत प्रकृष्ट उदय होते रहने से अभव्य आत्माका मन:पर्ययज्ञानरहितपन और केवलज्ञान रहितपन इन दो स्वभावोंसे तदात्मक एकरस परिगमन होता रहता है । अतः स्याद्वादसिद्धान्त अनुसार कोई भी दोष नहीं आता है । न च मनः पर्ययादिसदसत्त्वमात्रात् द्रव्यतो भव्येतरविभागः । किं तर्हि ? सम्यक्त्वादिव्यक्तिभावाभावाभ्यां भव्यभव्यत्वविकल्पः कनकेतरपाषाणवत् । न च ज्ञानावरणदयादज्ञोतिदुःखितस्ततोनाविरेव परमनिवृत्तिरिति दर्शनमुपपन्नं । कुतः पुनर्मत्याद्यावरणसिद्धिरित्याह " निर्णय इस प्रकार है कि मन:पर्यय आदिके केवल द्रव्यार्थिकनय अनुसार सत्त्वमात्रसे भव्यपनका और मन:पर्यय, केवलज्ञानोंके असद्भावसे अभव्यपनका द्रव्यरूपेण विभाग नहीं है । क्योंकि अनेक दूरभव्य जीव भी मन:पर्यय और केवलज्ञान को नहीं पासकेंगे ऐसा सिद्धान्त है । अभव्यका द्रव्य भी मन:पर्यय, केवलज्ञान शक्तियोंसे तन्मय हैं । फिर भव्यपन और अभव्यपनका विभाग किस प्रकार है ? इस प्रश्नका उत्तर यों है कि सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान आदि पर्यायोंकी व्यक्ति हो जानेके सद्भावसे भव्य नामका विकल्प निर्णीत है और सम्यग्दर्शन आदिकी व्यक्ति नहीं होनेके कारण अभव्यपनका विकल्प व्यवस्थित है, जैसे कि कतकपाषाण और अन्धपाषाण है । स्वर्णपाषाण में विद्यमान होरहे सुवर्ण की प्रयोगों द्वारा अभिव्यक्ति हो जाती है और अत्यन्त गूढ होरहे सोनेको शक्तिरूपेण धार रहे अन्धपाषाण में से सहस्त्रों प्रयोग करनेपर भी स्वच्छ सोना नहीं निकलपाता है । अग्नि, जल, पात्रका निमित्त मिल जानेपर मूंग सीझ जाती है किन्तु सेकडों मन लक्कड़ जलानेपर भी टोरा मूंग नहीं पकती है । इसी प्रकार जिस जीवके सम्यग्दर्शन आदि पर्यायोंके व्यक्त होनेकी योग्यता है, वह भव्य है और जिसके सम्यग्दर्शनादि की अभिव्यक्ति की योग्यता नहीं है वह अभव्य है । शक्तिरूपेण मन:पर्यय के सद्भाव और असद्भावकी अपेक्षा करके भव्य, अभव्यका विकल्प नहीं है "भवितुं योग्यो भव्यः " यों भविष्यकालमें रत्नत्रयकी व्यक्ति योग्य हो जाने के अनुसार भव्यत्व है । अभव्यके कदाचित् भी औपशमिक सम्यग्दर्शनकी प्रकटता नहीं हो पायेगी । इस ससारी जीवके अनादिसे ज्ञानावरणका उदय होनेसे बारहवें गुणस्थानतक अज्ञानभाव
SR No.090501
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 7
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1980
Total Pages498
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size15 MB
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