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________________ ( ३६ कषायाध्यवसायस्थान और अनुभागबंधाध्यवसायस्थान संख्या में असंख्यात लोकपरिमाण है अतः स्थितिबंध और अनुभागबंध के उपयोगी इन अध्यवसाय स्थानों के विकल्पसे कर्मबंध असंख्यात नामकी विशेष संख्याको लिये हुये है । तथा ज्ञानावरण आदिके अनन्तानन्त प्रदेश परमाणुओं और अनन्तानन्त कर्मस्कन्ध परिणतियों के भेदसे कर्मबंध के अनन्त भेद है अथवा ज्ञानका आवरण कराना आदि तारतम्यरूप से हीनाधिकता को लिये हुये है यों अनन्त प्रकार के सुखदुःखों को देनेरूप अनुकूल अनुभवोंके अविभाग प्रतिच्छेदोंकी अपेक्षा करके कर्मके उन पूत्र अनन्तानन्तोंसे भी अनन्तानन्त गुणे अनन्तानन्त भेद है, कर्मों की शक्तियों के अविभाग प्रतिच्छेदोंको संख्या बहुत बडी अनन्तानन्त है । अतः संख्याते, असंख्याते और अनन्ते विकल्प पहिले प्रकृतिबंधके संभव जाते हैं । क्रमप्रयोजनं ज्ञानेनात्मनोधिगमात् ज्ञानावरणं सर्वेषामादावुक्तं । ततो दर्शनावरण मनाकारोपलब्धेः । तदनन्तरं वेदनीयवचनं तदव्यभिचारात् । ततो मोहाभिधानं तद्विरोधात् । आयुर्वचनं तत्समीपे तन्निबंधनत्वात् । तदनंन्तरं नामवचनं तदुदयापेक्षत्वात् प्रायो नामोदयस्य । ततो गं त्रवचनं प्राप्तशरीरादिलाभस्य संशब्दनाभिव्यक्तेः । परिशेषादन्ते अन्तरायवचनं ॥ ग्रन्थकार अब ज्ञानावरण, दर्शनावरण आदि कर्मोंके क्रमसे प्रयोग करनेका प्रयोजन कहते हैं । सब कर्मों के आदिमें ज्ञानावरण को इसलिये कहा गया है कि ज्ञान करके ही आत्माका अधिगम होता है, आत्माके स्वानुभवका निमित्त होनेसे ज्ञान प्रधान या पूज्य है, पूज्य ज्ञानका आवरण भी "नारायण प्रतिनारायण" न्याय अनुसार पहिले कहा गया है । उसके पश्चात् दर्शनावरण कहा गया है। क्योंकि साकार उपयोगवाले ज्ञानसे निराकार दर्शन जवन्य है | ज्ञान करके स्व और अर्थका प्रकट ग्रहण होता है, किन्तु दर्शन करके अर्थका मात्र अव्यक्त आलोकन हो जाता है अर्थविकल्पनास्वरूप आकारसे रहित उपलब्धि होनेके कारण दर्शनावरण पीछे कहा गया है । उस दर्शनावरण के अनन्तर वेदनीय कर्मका कथन है क्योंकि उन ज्ञान और दर्शनोंसे अव्यभिचार होने के कारण वेदना प्रवर्तती है मोहनीय कर्मकाल पाकर वेदनीय कर्म भी घाति कर्मोंके समान जीवके वास्तविक सुखको बिगाडता है अतः सूत्रकारने मोहनीयके आदिमे पढदिया है । उस वेदनीयके पश्चात् मोहनीयका कथन करना आवश्यक हैं कारण कि उन ज्ञान, दर्शन, सुखदुःखका विरोध करनेवाला मोह है । क्वचित् मोहनीय कर्म करके मूढ होरहा जीव न जानता है, न आलोकन करता है, और सुखदुःखों का वेदन भी नहीं कर पाता है। उन पूर्वोक्त कर्मोंके समीपमे पश्चात् आयु:कर्मका प्रयोग है, क्योंकि उस आयु: को ही कारण मानकर प्राणियों के सुख, दुःख आदि प्रवर्तते हैं । उस आयुः कर्मके अव्यवहित पश्चात् अष्टमोऽध्यायः
SR No.090501
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 7
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1980
Total Pages498
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size15 MB
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