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________________ ४२६) तत्त्वार्थश्लोकवातिकालंकारे छूट जाना मात्र क्रिया मोक्ष है। यों मोक्ष शद्बकी निरुक्ति कर व्युत्पत्ति कर लेनी चाहिये । संयोग, वियोग, द्वित्व, त्रित्व संख्या इत्यादि पदार्थ दो आदि पदार्थों में रहते हैं। छोडने योग्य कर्म मोक्तव्य हैं, और छोड देनेवाला आत्मा पुरुषार्थी मोक्षक है । इस अपेक्षासे केवल विप्रयोग यानी केवल वियोंग हो जाना इतनी क्रियाकी ज्ञप्ति हो जाती है। कर्मका विशेषण सूत्रमे कृत्स्न कहा गया है । कर्मोकी सत्ता, बन्ध होना, उदयमें आना, उदीरणा हो जाना, आदिक अनेक अवस्थायें हैं । मोक्षमें पौद्गलिक सम्पूर्ण कर्मोंका नाश तो हो ही जाता है । साथही कर्मोंकी तत्स्वरूप कृत्स्न अवस्थाओंसे भी कर्मोंका नाश हो जाता है । अतः सत्ता, बन्ध, उदय और उदीरपणा अवस्थाओंमें व्यवस्थित हो रहे आठों प्रकारके कर्मोंका कृत्स्न शब्द करके ग्रहण हो जाता है । उन र्मोके क्षय होनेका विभाग कैसा है ? इसका गुणस्थानोंकी उपेक्षा रखता हुआ वह विभाग आप्तोक्त आगमसे उपरिष्ठात् प्राप्त कर लेना चाहिये । अर्थात् किस २ गुणस्थानमें किन किन प्रकृतियोंका क्षय होता है । इस रहस्यको राजवात्तिक, गोम्मटसार, आदि महान् आर्ष ग्रन्थोंसे समझ लिया जाय । कि द्रव्यकर्मणामेव मोक्षः स्पादुत भावकर्मणामपीत्याशंकायामिदमाह - यहां कोई प्रश्न उठाता है कि क्या पौद्गलिक द्रव्यकर्मोके क्षयसेही मोक्ष हावगा ! अथवा क्या भाव कर्मोके क्षयसे भी मोक्ष हो सकेगी? इस प्रकार आशंका प्रवर्तनेपर सूत्रकार महाराज इस अग्रिम सूत्रको स्पष्टरूपेण कह रहे हैं। - औपशमकादिभव्यत्वानां च ॥३॥ उपशम सम्यक्त्व, उपशमचारित्र इन औपमिक भाव और मतिज्ञान आदिक क्षायोपशमिक भावको आदि लेकर भव्यत्व पर्यन्त भावकर्मोंका भी क्षय हो जानेसे मोक्ष होती है । अर्थात् दोनों औपशमिक भाव, अठारहों क्षायोपशमिकभाव, इकईसों औदयिक भाव और पारणामिक भव्यत्वभावका मोक्ष अवस्थामें क्षय हो जाता है । अभव्यत्व भाव तो मोक्षगामी जीवके है ही नहीं। " भविया सिद्धि जेसि जीवाणं ते हवन्ति भवसिद्धा, तविवरीया भन्वा संसारादो ण सिज्झन्ति ॥" जिनकी भविष्यमें सिद्धि होनेवाली है। वे जीव भव्य हैं किन्तु जिनकी सिद्धि हो चुकी वे तो भूत सिद्ध हैं। उनमें भविष्य कालकी अपेक्षा रखनेवाला भव्यत्व नहीं
SR No.090501
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 7
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1980
Total Pages498
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size15 MB
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