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________________ ४०२) तत्त्वार्थश्लोकवातिकालंकारे एक समयमें नियमित संभावित देखे जा रहे परिणाम जीवके मर्यादित हैं। तीनों करणोंके परिणामोंकी मर्यादा न्यारी न्यारी है । उन तीन परिणामोंमें पहिला करण सातिशय अप्रमत्त गणस्थानमें होता है। पहिले पहिले समयोंमें जिस प्रकारके परिणाम प्रवृत्त हुये है उनके पश्चात् उत्तर समयोंमें भी वैसे ही परिणाम चारों ओरसे प्रवृत्त हो जाय वे चारित्र गुणके विशिष्ट रूप हो रहे परिणाम अथाप्रवृत्तकरण शद्ध करके वाच्य हो जाते हैं। दूसरे अपूर्वकरण नामक प्रयोग करके आठवें अपूर्वकरण क्षपक गुणस्थान नामका अनुभव कर नवीन नवीन शुभ परिणामोंको विचार रहा आत्मा पहिले ध्याये गये धर्म्यध्यान और वर्तमानमें ध्याये जा रहे शुक्लध्यानके अभिप्राय (नय विचार) करके पापकर्म प्रकृतियोंके स्थितिबन्ध और अनुभाग बन्धको कृष कर देता है । वही आत्मा पुण्य कर्मों के अनुभागको बढिया बढा चुका सन्ता नवमे गुणस्थानमें अनिवत्तिकरणको प्राप्त करके " अनिवत्तिवादरसांपरायक्षपक" गणस्थानपर चढता है। यहां दशमें गुणस्थानकी अपेक्षा कषाय मोटी है, निवृत्ति नहीं है। अतः इसका नाम अन्वर्थ है । जैसा नाम है वैसा ही अर्थ है । - तत्राप्रत्याख्यानप्रत्याख्यानकषायाष्टकं नष्टं विधाय नपुंसकवेदविनाशं कृत्वा स्त्रीवेदं समूलकाषं कषित्वात्र हास्यरत्यरतिशोकभयजुगुप्सालक्षणं नोषायषट्कं पुंवेदे प्रक्षिप्य क्षपयित्वा पुंवेदं क्रोधसंज्वलने च क्रोधसंज्वलनं मानसंज्वलने, मानसंज्वलन मायासंज्वलने, मायासंज्वलनं लोभसंज्वलने, लोभ संज्वलनं क्रमेण वादरकिदृिविभागेन विनाशमानयति । वादर किदिरिति कोर्थः । उपायद्वारेण फलं भुक्त्वा निर्जीर्यमाणमुद्धत शेषमुपहतशक्तिकं कर्म किदिरित्युच्यते आज्य किदिवत् । सा किदिद्विधा भवति । बादर. कि दिसूक्ष्मकि दिभेदादिति किदृिशद्वस्यार्थी वेदितव्यः । तत्पश्चाल्लोभसंज्वलनं कृषीकृत्य सूक्ष्मसांपरायक्षपको भूत्वा निःशेषं मोहनीयं निर्मूल्य क्षीणकषायगुणस्थाने स्फेटितमोहनीयभारः सन्नधिरोहति । तस्य गुणस्थानोपांत्य समयेत्त्यसमयात्प्रथमसमये द्विचरमसमय निद्राप्रचले द्वे प्रकृती क्षपयित्वा अन्त्यसपये पंच ज्ञानावरणानि, चत्वारि दर्शनावरणानि। पंचान्तरायान् क्षपयति तदनन्तरं केवलज्ञान, केवलदर्शनस्वभाव केवलं संप्राप्याचिन्त्य विभूतिमाहात्म्यं प्राप्नोति । - उस नवमें गणस्थ नमें अप्रत्याख्यानावरण कर्म, क्रोध, मान, माया, लोभ और प्रत्याख्यानावरण कर्म क्रोध, मान, माया, लोभ इन आठों कषायोंको नष्टकर पुनः नपुंसकवेदका विनाश करके और स्त्रीवेद कर्मको मूलसहित कसते हुये वधकर पश्चात्
SR No.090501
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 7
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1980
Total Pages498
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size15 MB
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