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________________ नवमोध्यायः ३३७) " कारण है । और मूर्च्छा हो जाना उसका कार्य है, कारणसे कार्य हो यही जाय ऐसा कोई नियम नहीं है । " नहि कारणानि अवश्यं कार्यवन्ति " | अनेक कारण अन्य सामग्री के नहीं मिलनेपर कार्य करनेसे वञ्चित पड़े रहते हैं । अतः साधुओंके विषय ग्रहण होनेपर भी मूर्च्छा नहीं मानी जा सकती है ! आचार्य कहते हैं कि उस वादी के यहाँ विषयका सद्भाव नहीं होनेपर मूर्च्छाका उदय हो जाना सिद्ध नहीं हो पावेगा । जब कि हम देखते हैं कि " उत्पद्यन्ते विलीयन्ते दरिद्राणां मनोरथाः रुपया, पैसा, कोठी, दुकानें नहीं होते हुये भी दरिद्र जीवोंके अनेक झूठे मनोरथ उपजते रहते हैं, नष्ट होते रहते हैं । करोडों भूखे पेट रहते हैं । एतावता क्या उनके ऊनोदर तप कह दिया जायगा ? असंख्य पशु, पक्षी, नग्न रहते हैं । क्या इनको आचेलक्य संयमी कह देवें ? घरमें बैठा हुआ धीवर ( मच्छलीमार ) क्या अहिंसक है ? । श्मश्रुनवनीतको क्या परि ग्रहत्यागी कह सकते हैं ? बात यह है कि इन सबके अन्तरंगमें महामूर्च्छा अग्नि संक्षित हो रही है, अतः ये संतोषी परिग्रही चक्रवर्तीसे भी अधिक महापरिग्रही हैं । विषयोंके नहीं होनेपर भी जीवोंसे तीव्र मूर्च्छा लग रही है । अतः मूर्च्छाही अन्तरंग कारण है । तभी बहिरंग विषयोंके ग्रहण में प्रवृत्ति हो जाती है । तिसकारण आत्मामें मोहकर्मका उदय हो जानेसे मूर्च्छा परिणाम होता है, और उस मूर्च्छाके हो जाने से उस मोही जीवकी स्वकीय विषयों में ग्रहण करनेकी प्रवृत्ति हो जाती है। जिस जीवके स्वयं यह विषयोंका ग्रहण विद्यमान है । उस मोही जीवके निर्ग्रन्थपना कदाचित् भी नहीं समझा जायगा । अर्थात् केवल सिर मुडा लेनेसे या तीर्थजल स्नान कर लेने मात्र से धार्मिकपनका अन्वयव्यतिरेक होवे तो मुडी हुयी भेड या मच्छली, मैडके बगे धर्मात्मा समझे जावेंगे । बात यह हैं कि अंतरंग परिग्रहकी पोट उतारे विना और आत्मीय शुद्धि विना कोई भी मोक्षमार्ग में संलग्न नहीं हो पाता है । जो परिग्रहोंको रखते हुये भी अपनेको उनसे अलिप्त बता रहे हैं, वे दयनीय हैं, इससे अधिक उनकी कोई आत्मवंचना नहीं हो सकती है । जैनेंद्र सिद्धान्त अनुसार उनको समीचीन बोधि प्राप्त होवे ऐसी सद्भावना है । यों युक्तियोंसे परपक्षका निराकरण करते हुये पांचो मुनिवरोंका निर्ग्रन्थपना साधकर स्वपक्ष पुष्ट किया गया है । प्रकृष्टापकृष्टगुणानां निर्ग्रन्थत्वाभावश्चारित्रभेदात् गृहस्थ वदिति तं प्रत्याह-न च दृष्टत्वाद्ब्राह्मणशद्ववत् । न हि जात्याचाराध्ययनादिभेदाद्भिन्नेषु ब्राह्मणत्वं विरुध्यते, संग्रहव्यवहारापेक्षत्वात् निश्चयनयादेव समग्रगुणेषु तद्व्यपदेशसिद्धेः । कि च, दृष्टिरूपसामान्यात् सर्वेषां निर्ग्रन्थता न विरुध्यते ।
SR No.090501
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 7
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1980
Total Pages498
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size15 MB
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