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________________ ३३२) तत्त्वार्थश्लोकवातिकालंकारे प्रथमसम्यक्त्वादिप्रतिलम्भे अध्यवसायविशुद्धिप्रकर्षादसंख्येयगुनर्जरत्वं दशानां । प्रथमं हि भव्यस्योपशमसम्यक्त्वं तदात्यो वेदकसम्यक्त्वक्षायिकसम्यग्दर्शनश्रावकत्वादयः सूत्रोक्तास्तत्र प्रतिलब्धाध्यवसायविशुद्धिप्रकर्षाद्दशानामपि क्रमादसंख्येयगुणनिर्जरत्वमुपपद्यते । क्षपक इत्यसाधुरन्वाख्यानाभावादिति चेन्न, च शब्देनमित्संज्ञोपलब्धः दे जै यै क्षये इत्यस्य कृतात्वस्य णौ पुकि कृते जनी-जषक्नसु-रजोऽमन्ताश्चेति च शद्वेन मित्संज्ञोपलब्धे हृस्वत्वात् साधुरेव क्षपकशब्द इत्यर्थः । प्रथमोपशमसम्यक्त्व, श्रावकपन, आदि प्रशस्त परिणामोंकी प्राप्ति हो जानेपर आत्मीय पुरुषार्थ स्वरूप अध्यवसायकी विशुद्धिका प्रकर्ष हो जानेसे उक्त दशों स्थानोंके (में) असंख्यात गुणी निर्जराका हो जाना प्रमाणसिद्ध हो जाना है। प्रथमही अनादि मिथ्यादृष्टी भव्यजीवके उपशम सम्यक्त्व होता है। उसको आदि लेकर पुनः सम्यक्त्व प्रकृतिका वेदन होते रहने देनेवाला क्षयोपशम सम्यक्त्व उपजता है । क्षयोपशम सम्यग्दर्शनसेही क्षायिक सम्यग्दर्शन होनेका मार्ग है। पांचवें गुणस्था नमें श्रावकपना तीनों सम्यग्दृष्टियोंके संभवता है, किन्तु यहां प्रकरणमें उपशम सम्यक्त्व और क्षयोपशम सम्यक्त्वको धारनेवाला संयमासंयमी श्रावक लिया जाय । क्योंकि दर्शनमोहनीयका क्षय करनेवाला पांचवे स्थानपर कंठोक्त हो रहा है । श्रापकपनसे आगे विरतपन और अनंतवियोजकपन आदि गुणधारी पुरुषार्थी जीव सूत्रमें कहे जा चुके हैं। उन उन पुरुषार्थपूर्वक हुये परिणामोंमें प्रत्येक में प्राप्त की गयी प्रयत्नाध्यवसायोंकी विशुद्धिका बढनेसे क्रमक्रमसे दशों भी स्थानोंका असंख्येयगुणी निर्जराका धारीपना युक्तिपूर्वक सिद्ध हो जाता है। यहां कोई अपरिपक्व वैयाकरण आक्षेप कर रहा है कि सूत्रमें कहा गया क्षपक शब्द तो व्याकरण नियमसे साधु सिद्ध नहीं होता है। क्योंकि अन्वाख्यानमें मित संज्ञा होती है। यहां अन्वाख्यान नहीं है।'' किंचित्कार्यं विधातुमुपात्तस्य कार्यान्तरं विधातुं पुनरुपादानमन्वादेशः" । किसी कार्यका विधान करनेके लिये ग्रहण किये जा चुके का पुनः अन्य कार्यका विधान करनेके लिये उपादान करना अन्वादेश है। जैसे कि इसने व्याकरण पढा है, अब इसको न्यायशास्त्र पढाओ । अन्वादेश होता तब तो मित्संज्ञा होकर -हस्व हो सकता था, यों क्षपक शब्द साधु बन जाता । ग्रन्थकार कहते हैं कि यह तो नहीं कहना क्योंकि च शद्ध करके मित्संज्ञा होना देखा जाता है। भ्वादिगणकी " क्षै, जै, पै. क्षये" क्षै इस धातुको आत्व कर लेनेपर णि प्रत्यय परे रहते सन्ते पुक करनेपर
SR No.090501
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 7
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1980
Total Pages498
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size15 MB
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