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________________ ३३०) तत्त्वार्थश्लोकवातिलंकारे निर्जरा हो जाती है । सम्यग्दृष्टीकी अपेक्षा पांचवें गुणस्थानवर्ती श्रावककी कर्मनिर्जरा असंख्यातगुणी है । श्रावकसे छठे, सातवें गुणस्थानवर्ती विरत मुनिकी कर्मनिर्जरा असंख्यातगुणी अधिक होती रहती है । सातवें गुणस्थानवाला मुनि द्वितीयोपशम सम्यक्त्वको धारनेके लिये जब अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभोंका विसंयोजन करने में तत्पर होता है। तब पहिले विरत मुनिसे असंख्यातगुणी निर्जरावाला है। चौथेसे लेकर किसी भी सातवें तक चार गुणस्थानोंमें क्षयोपशम सम्यग्दृष्टी मनुष्य जब केवली या श्रुतकेवलीके निकट दर्शन मोहनीयकी तीन प्रकृतियोंका क्षय करनेके लिये उद्यत हो जाता है। तब पूर्वोक्त अनन्तवियोजकसे असंख्यातगुणी कर्म निर्जराका धारी है। एवं द्वितीयोपशम सम्यग्दृष्टी या क्षायिक सम्यग्दृष्टी होकर वह जब चारित्र मोहनीयकी इकईस प्रकृतियोंका उपशम करनेके लिये व्यापार करता है। उपशमक नामको धार रहा पूर्वोक्तसे असंख्यातगुणी निर्जराका अधिकारी है। और वही फिर ग्यारहवें गुणस्थानमें मोहनीयको इकईसों प्रतियोंका उपशम कर चुका उपशान्तमोह जीव पूर्वोक्त उपशमकसे असंख्यातगुणी कर्मनिर्जराको करता रहता है । क्षायिक सम्यग्दृष्टी जीव क्षपक श्रेणीपर चढ रहा जब चारित्र मोहनीयकी इकईस प्रकृतियोंका क्षय करनेके लिये समुद्यत होता है। तब मोहक्षपक नामको धार रहा क्षपकश्रेणीसे आठवे, नवमें, दशवें, गुणस्थानोंमें ग्यारहवें गुणस्थानवालेसे असंख्यात गुणित कर्मोंकी निर्जरा कर लेता है। और वही जीव जो कि चारित्र मोहनीयका पूर्णरूपेण क्षय कर चुका क्षीणकषाय नामकधारी होकर पूर्वोक्त क्षपकसे असंख्यातगुणी कर्मनिर्जराको करता चला जाता है। वही क्षीणमोह आत्मा जब दूसरे शुक्लध्यान द्वारा घातिकर्मोंका समूल नाश कर चुका जिनेंद्र नामका धारी होकर तेरहवें, चौदहवें, गुणस्थानोंमें पूर्वोक्त क्षीणमोहसे असंख्यात गुणी कर्मनिर्जरा कर लेनेका प्रभु है । यों इन दश स्थानोंमें क्रमक्रमसे आत्मा कर्मोकी असंख्यात गुणी निर्जरा करता हुआ अन्तमें सर्वकर्मोकी मोक्षदशाको प्राप्त कर लेता है। उत्तरोत्तर काल संख्यातगुणा हीन है यह कहा जा चुका है । " तव्विवरीया काला" __किमर्थमिदमप्रस्तुतमुच्यते ? तपसानिर्जरा चेति प्रकृते तपसि बाह्येभ्यन्तरे च ध्यानपर्यन्ते व्याख्याते सर्वसम्यग्दृष्टीनां यथासम्भवं बाह्यरूपेणाभ्यन्तररूपेण च तपसा समाननिर्जरात्वप्रसक्तौ तद्विशेषप्रतिपादनाथ प्रस्तुतमेवेदं युक्तमभिधातुं । कुतः पुनः सम्यग्दृष्टयादयोऽसंख्येयगुण निर्जराः क्रमाद्भवन्तीत्याह; -
SR No.090501
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 7
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1980
Total Pages498
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size15 MB
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