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________________ अष्टमोऽध्यायः ग्रन्थकार कहते हैं कि यह तो न कहना, क्योंकि वह जिन आगम सातिशय ज्ञानोंकी खान है। जैसे कि रत्नोंकी उत्पत्ति समुद्र या खानोंसे ही होती है उसी प्रकार सातिशय तात्त्विक ज्ञानोंकी उत्पत्ति जिनागमसे ही होती है। यहां कतिपय दार्शनिक आक्षेप करते हैं कि अन्यत्र व्याकरण, छन्द, ज्योतिष, वैद्यक, नव्य न्याय, शारीरिक विज्ञान, शल्यचिकित्सा, साईन्स, भूगर्भविद्या आदि में भी सातिशय ज्ञान देखें जा रहे हैं । अतः ये भो परमागम हो सकते हैं ? आप जिनागम को ही सम्पूर्ण ज्ञानोंकी खान या ताली क्यों बखान रहे हैं ? । आचार्य कहते हैं कि यह तो न कहना, क्योंकि इस जिनागमसे ही उन सम्पूर्ण सातिशव ज्ञानोंकी उत्पत्ति होती है । पूर्व आचार्योने यही कहा है कि नैयायिक, वैयाकरण, सोइन्टफिक,वैद्य, भूगर्भशास्र वेत्ता, पुरातत्त्ववेत्ता, डाक्टर फिलौसफर, आदि विद्वानोंके तत्त्वोंमे जो कुछ भी सुन्दर ज्ञानातिशय दीख रहे हैं। द्वादशांगमे सम्पूर्ण ज्ञान, विज्ञान, कलायें अन्तर्भूत हैं, जगत्के सम्पूर्ण ज्ञानोंका जनक आहेत प्रवचन हैं। श्रद्धामात्रमिति चेन्न भूयसामुपलब्धेः रत्नाकरवत्। तदुद्भवत्वात्तेषामपि प्रामाण्यमिति चेन्न निस्सारत्वात् काचादिवत्, सर्वेषामविशेषप्रसंगात्। मीमांसक, वैशेषिक, आदि अन्य दार्शनिक विद्वान् कह रहें हैं कि अरहंत भगवानका कहा हुआ ही आगम सम्पूर्ण सातिशयज्ञानोंका आकर हैं यह जैनों का कहना अपने मत की केवल श्रद्धा हैं, युक्तियोंको नही सह सकता हैं, श्रद्धा प्रेमवश होकर सभी मातायें अपने बालक को सर्वसुन्दर समझती हैं उसी प्रकार जैन भी अपने आगमपर अन्धश्रद्धा रखते हुये स्वकीय अहंत प्रोक्त प्रवचन को पावन ज्ञानोंका उत्पादक समझ बैठे हैं, क्या हिंसा, चोरो, शस्त्रनिर्माण, मारण उच्चाटन प्रयोग मिथ्यात्वपोषक या रागवर्धक कामशास्त्र, छू तक्रीडा परस्रीवशीकरण, वाजीकरण आदि के प्रतिपादक वचनोंको अरहंत भगवान कहेंगे? कभी नही, आचार्य कहते हैं कि यह तो नहीं कहना क्योंकि जैसे गांव, नगर, राजधानी आदिमे धनपति, सेठ, भूमिपति, राजा, महासजाओंके यहां पाये जा रहे रत्नोंके आद्य उत्पत्तिस्थान समुद्र या खाने ही हैं, गांव, नगर, बगीचा, सरोवर आदि नही है, उसी प्रकार सम्पूर्ण अतिशय ज्ञानोंका प्रभवस्थान जैन प्रवचन ही निर्णीत किया जाता है। चौंसठि कलायें, कामसूत्र, वैद्यविद्या, सामुद्रिक, स्वरशास्त्र, भूमिविज्ञान, आदि सभी सिद्धांतोंका निरूपण जैन शास्त्रोंमे पाया जाता हैं, पूर्वपक्ष अनुसार या निषेधने योग्य कही गयी प्रक्रियां अनुसार सांख्य दर्शन हिंसा प्रकरण, चूत क्रीडा, रसायनविधि, आदि सभी बातोंको जैन शास्त्रोंमे दरशाया गया है।
SR No.090501
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 7
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1980
Total Pages498
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size15 MB
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