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________________ नवमोऽध्यायः २४७) इन्द्रिये गेज्जं, जद्दन्नं अविभागी तं परमाणु वियागेहि।" इस स्वरूप को धारण करती है और परमाणु का ज्ञान या परमाणु अतीन्द्रिय शक्तियां भावपरमाणु है ज्ञान तो आत्मा के चेतना गुण की पर्याय है और परमाणु की शक्तियां पुद्गलद्रव्य स्वरूप हैं अतः द्रव्य परमाणु या भावपरमाणु कोई अर्थ की पर्याय नहीं है ऐसा नहीं समझ बैठना। क्योंकि वे द्रव्यपरमाणु या भावपरमाणु दोनों ही पुद्गल आदि ( आत्मा ) द्रव्यों की पर्याय हैं इस सिद्धान्त की पूर्व प्रकरणों में कई बार चिन्तना कर चुके हैं यहां कहना निरर्थक है। ततोयं ध्यानशब्दो भावकर्तृकरणसाधनो विवक्षावशात् ध्येयं प्रति व्यावृतस्य भावमात्रत्वात् ध्यातिव्यनिमिति भवति । करणप्रशंसापरायां वृत्तौ कर्तसाधनत्वं ध्यायतीति ध्यानं । साधकतमत्वविवक्षायां करणसाधनं ध्यायत्यनेन ज्ञानावरणवीर्यान्तरायविगमविशेषोद्भुतशक्तिविशेषेणेति ध्यानमिति । एकान्तकल्पनायां दोषविधानमुक्तं । तिसकारण यह ध्यान शब्द विवक्षा के वश से भाव में या कर्ता मैं अथवा करण में युट् प्रत्यय कर साध दिया गया है। ( ध्यानमात्रं ध्यानं ) सामान्य रूप से ज्ञप्तियों रूप ध्यान करना स्वरूप क्रियाओं की अपेक्षा करनेपर ध्यान शब्द भावसाधन है क्योंकि ध्यान करने योग्य पदार्थ के प्रति व्यापार कर रही क्रियाभाव मात्र है ऐसा होनेसे " ध्यातिानम् " इस प्रकार भावमे क्ति प्रत्यय कर निर्वचन कर दिया है। करण की प्रशंसा करने में तत्पर हो रही वृत्ति होते सन्ते तो ध्यान शब्द को कर्ता मे युट् प्रत्यय कर साध लिया जाय, ध्यान करनेवाला है इस कारण वह करण स्वयं ध्यान कर्ता है जैसे कि " देवदत्तः असिना छिनत्ति देवदत्तः किं छिन्नत्ति असिः स्वयमेव छिन्नत्ति " देवदत्त तलवार से लेज ( रस्सी ) को काट रहा है देवदत्त क्या कर रहा है तलवार ऐसी उत्तम है जो कि स्वयं ही रस्सी को काटती चली जा रही है। यहाँ काटने मे करणभूत तलवार है, कर्ता देवदत्त है, किन्तु तलवार की बडाई करना जब अभीष्ट हो जाता है तो करण हो रही तलवार को ही कर्ता कोटि में ले आते है इसी प्रकार ध्यान वस्तुतः ध्यान क्रिया का करण है, जैसे कि ज्ञप्तिक्रिया का करण ज्ञान है। फिर भी करण हो रहे ध्यान की प्रशंसा करना अपेक्षित होनेपर स्वतंत्र कर्ता रूपसे ध्यान का उल्लेख किया जाता है। आत्मा क्या ध्यान करता है ? वह ध्यान ही स्वयं ध्यान कर रहा है। तीसरी ध्यान क्रिया में प्रकृष्ट उपकारकपने की विवक्षा करनेपर जिस करके ध्यान किया जाय वह ध्यान है, यों करण में युट् प्रत्यय कर ध्यान
SR No.090501
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 7
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1980
Total Pages498
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size15 MB
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