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________________ तत्त्वार्थश्लोकवातिकालंकारे १९८) निवत्ति करनेमे तत्पर हो रहा है तथा रसपरित्याग तप भो खाद्य, पेय, द्रव्यों को एकदेश रूपेण निवृत्ति करनेमे लग रहा है, तिस कारण इनमे महान् भेद प्रसिद्ध है । वृत्तियोंकी मात्रगणना प्रसिद्ध कर देना और खाद्य पेयोंको पूर्णतः या एकदेशतः निवृत्ति कर देना इनमे महान अत्तर है, अतः चारों तप स्वतन्त्र है,कोई किसोमे गभित नहीं हो सकता है और न कोई किसीका प्रकार है। - आबाधात्ययब्रह्मचर्यस्वाध्यायध्यानादिप्रसिद्धयर्थ विविक्तशय्यासनं । कायक्लेिशःस्थानमौनातपनादिरनेकधा। देहदुःखतितिक्षा सुखानभिष्वंगप्रवचनप्रभावनाद्यर्थः । परीषहजातीयत्वात् पौनरुक्त्यमिति चेन्न, स्वकृतक्लेशापेक्षत्वात् कायक्लेशस्य । सम्यगित्यनुवृत्तेर्दृष्टफलनिवृत्तिः, सम्यग्योगनिग्रहो गुप्तिरित्यतः सम्यग्ग्रहणमनुवर्तते । बाह्यद्रव्यापेक्षत्वाद्वाह्यत्वं, परप्रत्यक्षत्वात् तीर्थ्यगृहस्थकार्यत्वाच्चानशनादेः। एतच्च कर्मनिर्दहनात्तपः, देहेंद्रियतापाद्वा । केषां पुनः कर्मणां संवरः स्यात्तपसोऽस्मादित्याह । निकटवर्ती जोवोंद्वारा कियी जाने योग्य आवाधाओंका परिहार, ब्रम्हचर्य धारण, निराकुल स्वाध्याय करना, अच्छा ध्यान, व्यर्थ बोलने पडनेकी आपत्ति से बच जाना आदिकी अच्छी सिद्धि हो जाने के लिए विविक्तशय्यासन तप किया जाता हैं । जीव रहित एकान्त स्थलमे शयन करने या आसन जमाने से उक्त ब्रम्हचर्य आदि की निष्पत्ति सहजमे हो जाती है । छठा कायक्लेश नामका तप तो प्रतिमा योग धारण कर स्थित हो जाना, मौनव्रत रखना, मध्यान्ह मे सूर्य सम्मुख आतपन योग धारण करना, कठिन आसन लगाना, आदिक अनेक प्रकार हैं, जोकि शरीरके दुख उपस्थित होने पर सहनशोल बन जाना, वैषधिक सुखों के कारणों में आसक्ति नहीं कर गैठना, जिनशासन की प्रभावना, कर्मों को निर्जरा आदिके लिये किया जाता है। यहां कोई आक्षेप करता है कि यह आतपनयोग, मौनधारण आदि स्वरूप हो रहा कायक्लेश तो परोषहों को ही जातिका है, अतः पुनः उपदेश करनेसे पुनरुकाता दोष आया। आचार्य कहते हैं कि यह तो न कहना, क्योंकि अपने आप चलाकर बुद्धिपूर्वक कायक्लेश किया जाता है और इच्छाके विना ही कारणवश परीषहें प्राप्त - हा जाती है । यों अपने द्वारा किये गये क्लेश की अपेक्षा हो जाने से कायक्लेश का परीषहों से भेद है। इस सूत्रमे " सम्यग्योगनिग्रहो गुप्तिः" इस सूत्रसे सम्यकपदकी अनुवृति चलो आ रही हैं, सम्यक् इसको अनुवत्ति हो जानेसे लोक में देखे जा रहे फलोंकी नवृति कर दो जाती है। जा लोकित फको ओझा र वर ता किये जायेंगे, वे
SR No.090501
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 7
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1980
Total Pages498
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size15 MB
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