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________________ अब पांचवा वाच्यार्थ सुनो। " अहं तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकमाध्याय प्रवक्ष्यामि । अब में तत्त्वार्थश्लोकवातिकका चिंतन करके उसका वर्णन करता हूं। विनय तपकें ज्ञानविनय, दर्शनविनय, चारित्रविनय तथा उपवारविनय “ऐसे चार भेद हैं उनमे ज्ञानविनय प्रधान है, श्रेष्ठ है। शुद्ध अन्तकरणमे जब अपने आत्मस्वरूप का अनुभव उत्पन्न होता है तब उस आत्मानुभका उपयुक्त ऐसे आत्मज्ञानकी वृद्धि होती है । उस आत्मज्ञान का बहुमनन अतिशयमनन जब होता है तब उस मनन को जानविनय कहते हैं। जगतके सर्व परद्रव्योंसे अपने मनको हटाकर अपने आत्माके जो स्वाभाविक गुण हैं उनका चिंतन हो मुक्तिका साक्षात् कारण है ऐसा समझकर-जानकर अपने आत्मासे पूर्णरूपसे विराजमान हुए पूज्य. ज्ञानस्वरूप श्लोकवार्तिक ग्रंथका ध्यान करके प्रवचनरूपसे श्लोकवार्तिक ग्रयको मैं कहूंगा अर्थात् उसकी रचना करूंगा । पूर्वाचार्यों का अनुसरण करके पदवाक्यरूपसे में ग्रंथ'चना करूगा " ऐसी प्रतिज्ञा ग्रंथकार करता है । जो ऊहापोहसे जो शोभायुक्त है- तथा प्रतिवादिरूप हाथिओं को भगानेके लिये जो सिंह गर्जनाके समान है तथा प्रति समय जो नये नये अखण्डय विचार तर्कोको धारण करती है, तथा जो स्याद्वाद सिद्धांतोंका सर्वत्र प्रचार करती है, जो विद्वान लोगों के मनमे चमत्कार उत्पन्न करती है तथा पढनेवाले शिष्य तथा विद्वान् लोकोंके ज्ञानको निर्मल नर्दोष व विशद बनाती है ऐसी जो तर्कणा लक्ष्मी उससे जो उत्तरोत्तर बढ़ रहा है ऐसे श्लोकवाति ग्रय की में रचना करूंगा। आचार्य विद्यानंद इस ग्रंयका आध्याय घातिसवातघातनम् । ' इस विशेषण द्वारा महत्त्व दिखाते हैं- यह वार्तिक ग्रंथ सर्व प्रकारोंसे सम्यग्ज्ञानकी प्राप्ति करनेवाला है। अर्थात् आत्माके ज्ञानस्वरूपका नाश करनेवाले जो मतिज्ञानावरण, श्रुतज्ञानावरण घाहि कर्म हैं उनका उदयाभावरूप क्षय करनेवाला यह ग्रंथ है । अर्थात् यह ग्रंथ कुयुक्तियोंका और अपसिद्धांतोंका नाश करनेवाला है। यह ज्ञानात्मक ग्रंथ 'विद्यास्पद ' है अर्थात् नैयायिक, मीमांसक, तथा वेदान्ती वगैरे विद्वानोंके जो न्याय, मीमांसादिक दर्शनोंके विद्याओंको पूर्वपक्षमे रखकर उतरपक्षमे जैनसिद्धांत और जैन न्यायके द्वारा उनका खंडन किया है । इस प्रकार यह ग्रंथ तत्त्वार्थसूत्रके श्लोककेंअर्थात् यशका वर्णन करनेके प्रयोजनको धारण करनेवाला होनेसे अन्वर्थ नामको धारता है। इस प्रकार महापंडितोंके योग्य एसे जो अनेक गणों तथा धर्मोंसे श्री विद्यानन्द स्वामी में बडप्पन प्राप्त हुआ है और उससे वे अतिशय शोभायुक्त हुए हैं । मनसे, वचनोंसे तथा शरीरसे पूजनीय जैनाचार्योके पदकमलोंकी धूली रूप अमृतसे जिसका शरीर लिप्त हुआ है, और जो श्री विद्यानन्द स्वामीके गुणोंमें अनुरक्त है ऐसा मैंमाघ शुक्ल पंचमी, माणिकचन्द्र न्यायाचार्य वीर निर्वाण संवत् २४६७ जंबू विद्यालय, सहारनपुर ।
SR No.090501
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 7
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1980
Total Pages498
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size15 MB
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