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________________ ( १५ ) कं आध्याय प्रवक्ष्यामि- मैं शुद्ध परमात्मस्वरूपको जो प्राप्त हुए हैं ऐसे सिद्ध परमेठी का मनमें स्मरण करता हूं । तदनंतर शास्त्राथ करनेके कार्यमें मैं सिंहके समान स्वभाववाला हूं। जैसे सिंह मत्त हाथियोंके कुंभस्थल विदारण करने में तत्पर होता है वैसे मैं भी प्रतिवादिदार्शनिक विद्वानोंको आव्हान देकर उनके मतोंका निराकरण करने में दक्ष ऐसी सप्तभङ्गी वाणी का निरूपण करूंगा । वे सिद्धपरमेष्ठो श्री वर्धमान श्रीवान् हैं अर्थात् अन्तरग बहिरंग लक्ष्मीको देते हैं तथा वे सिद्धपरमेष्ठी अनन्तानन्त संख्याके परिमाणको धारण करनेवाले हैं। वे सिद्ध केवल अपने अस्तित्वसे ही नाना भव्य जीवोंके हितके लिये कारण होते हैं। तथा स्वाभाविक परिणतिको ही सर्वदा धारण करते हैं । तथा वे अनन्तानन्त सिद्ध परमेष्ठा सिद्धक्षेत्रमे विराजमान होते हैं । पुन: वे सिद्धपरमेष्ठी कसे हैं ? उत्तर-घातिसंघात घातनम् आज्ञाके ज्ञानादि गुणोंका नाश करनेवाले कर्मों के समूहका नाश करनेवाले हैं । कौन कौन कर्म आत्माकं ज्ञानादि गुणोंका नाश करते हैं इस प्रश्नका उत्तर आगेकी दो गाथाओंसे आचार्य देते हैं मोहो खाइयसम्म केवलणार्ण च केवलालोयं । हणदि हु आवरणदुर्ग अणंतविरियं हणेइ विग्धं तु ॥ सुहुमं च णामकम्मं हणेइ आऊ हणेइ अवगहणं । अगुरुलहूण च गोद अव्वाबाहं हणेइ वेयणियं ॥ मोहनीय कर्म आत्माके क्षायिक सम्यग्दर्शनका नाश करता हैं । ज्ञानावरण कर्म तथा दर्शनावरण कर्म ये क्रमसे केवलज्ञान तथा केवलदर्शनको नष्ट करते हैं । तथा विघ्नकर्म-अन्तराय कर्म आत्माकी अनन्तशक्तिको नष्ट करता है । नामकर्म आत्माके सूक्ष्म गुणका-अमूर्तिकताका नाश करता है । तथा आयुकम अवगाहनगुणका नाश करता है । गोत्रकर्ममे अगुरुलघुत्वगुण नष्ट होता है और वेदनीय कर्म अव्याबाध गुणका घात करता है । इन दो गाथा प्रमाणरूपका अनुसरण करनेसे आत्माके सम्यक्त्वज्ञान, दर्शनादि आठ गुणों का विघातकत्व इन आठ कर्मोमे है यह सिद्ध होता है अत: सिद्ध भगवान वीर प्रभुमें ज्ञानावरणादि आठ कर्म तथा उनके उत्त तर प्रकृति समूहका विध्वंसकत्व सिद्ध होता है । पूनः वे सिद्ध परमेष्ठी वर्धमान कैसे है ? कथं भूतं क विद्यास्पदं-वे सिद्धपरमेष्ठी विद्याके केवलज्ञानके सार्वभौम अधिपति हैं । अथवा भावकर्म, द्रव्यकर्म, नोकर्म ये सिद्ध भगवानमेसे निकल जानेसें वे शुद्ध चिदानंद चैतन्य मात्रमे अवस्थान कर रहे हैं । उन सिद्धपरमेष्ठीका निरूपण मै कैसे करू ? तत्त्वार्थ श्लोकवार्तिक यथास्यात्तथा आत्मतत्त्वके हितका वर्णन करनेसे संसारसंबंधी पीडाका परिहार जैसा होगा उस प्रकारसे वर्णन करना। अब चतुर्थ अर्थका विद्वज्जन इस प्रकारसे विचार करें। · अहं विद्यास्पदं आध्याय प्रवक्ष्यामि' मै विद्यानन्द हूं और मझे जो तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति हुई है उसमे म ख्य-प्रधान आधार श्रेष्ठ गुरू श्री समन्तभद्राचार्यकी वाक्यपंक्ति ही कारण
SR No.090501
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 7
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1980
Total Pages498
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size15 MB
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