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________________ १२८) तत्त्वार्थश्लोकवातिकालंकारे भी हैं अनुकृष्टि रचना है अनन्तगुणी विशुद्धि और अप्रशस्तप्रकृतियों का अनुभागबन्ध अनन्तगुणा हीन पडना, तथा शुभ प्रकृतियों का अनन्तगुणी वृद्धि लिये हुये अनुभाग पडना, एवं भशुभप्रकृतियों में स्थिति भी न्यून पडना ये चमत्कार हो जाते हैं और अपूर्वकरणअनिवृत्ति करणों में तो अनेक अतिशय विद्यमान हैं। नौमे गुणस्थान का नाम अनिवृत्तिकरण है दशमे गुणस्थान की अपेक्षा नौमे में स्थूलकषाय हैं अतः अनिवृत्तिकरण परिणामों के वश से अनिवृत्तिबादरसांपराय गुणस्थानवाला जोव कर्म प्रकृतियों का स्थूलरूपेण उपशम कर रहा है और क्षपकश्रेणीवाला क्षय कर रहा है इस नौमे गुणस्थान में उपशम श्रेणी पर चढ' रहा जीव हास्य आदि छः, नपुंसकवेद, स्त्रीवेद, पुंवेद, अप्रत्याख्यानावरण, आदिक प्रकृतियों का उपशम कर रहा उपशमक है अथवा वही क्षपकश्रेणी पर चढ रहा अप्रत्याख्यानावरण आदि कषायों का क्षय कर रहा क्षपक है अन्य ग्रन्थों में उपशम विधि या क्षपक. प्रक्रिया का विशेष विस्तार है नौमे गुणस्थान में की गई बादरकृष्टि, सूक्ष्मकृष्टि अनुसार संज्वलन क्रोध का उदय अतीव सूक्ष्म रह जाता है । सूक्ष्म भाव करके कषाय का उपशम - या क्षय कर देने से सूक्ष्मसांपरायउपशमक, और सूक्ष्मसांपरायक्षाक जाना जाता है। ___ सर्वस्योपशमात्क्षपणाच्चोपशांतकषाय क्षीरणकषायश्च, घातिकर्मक्षयादनिर्भूतज्ञानाधतिशयः केवली। स द्विविधो योगभावाभावभेदात् । पहिले दश गुणस्थानों तक सम्पूर्ण मोहनीय कर्म का उपशम कर देने से उपशमश्रेणी चढ रहा जीव ग्यारहवें गुणस्थान में कषायों का उपशम कर चुका उपशांतकषाय हो जाता है तथा क्षपकश्रेणीवाला जीव पूर्ववर्ती गुणस्थानों में समस्त मोहनीयकर्म का क्षय कर चुका बारहमें गुणस्थान में क्षीण हो गयीं हैं कषाय जिसकी ऐसा क्षीणकषाय या क्षीणमोह कहा जाता है । ज्ञानावरण आदि चार घातिकर्मों का अत्यन्त क्षय हो जाने से प्रकट हो चुके केवलज्ञान, केवलदर्शन प्रभृति अनेक अतिशयों को धार रहा केवली हैं, योग का सदभाव और योग का अभाव इनमे दों से वे केवलज्ञानो दो प्रकार हैं । तेरहवें गुणस्थान में केवलज्ञानी के सत्यमनोयोग, अनुभयमनोयोग, सत्यवचनयोग, अनुभयवचनयोग, औदारिककाययोग, औदारिकमिश्रकाययोग, कार्मणकाययोग ये सात योग संभवते हैं । और चौदहवें गुणस्थान में केवलज्ञानी के कोई योग नहीं है, यों चौदह गुणस्थानों का सामान्य कथन कर दिया गया है। तत्र मिथ्यात्वप्रत्ययस्य कर्मरणस्तदभावे संवरो ज्ञेयः। असंयमस्त्रिविषोऽनन्ताः बंध्यप्रत्याख्यानप्रत्याख्यानोदयविकल्पात् तत्प्रत्ययस्य तदभावे संवरः, प्रमादोपनीतस्य तदभावे
SR No.090501
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 7
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1980
Total Pages498
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size15 MB
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