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________________ पंचम-अध्याय ११७ प्रकार समझ लिया जाय ? ऐसी जिज्ञासा होने पर श्री विद्यानन्द प्राचार्य वार्तिकों द्वारा उत्तर को कहते हैं तस्यैवैकप्रदेशस्ति यथैकस्यावगाहनं परमाणोस्तथानेकाणुस्कंधानां च सौम्यतः ॥ १॥ तथा चैकप्रदेशादिस्तेषां प्रतिविभिद्यतां । सोवगाहो यथायोग्यं पुद्गलानामशेषतः ॥२॥ उस ही लोकाकाश के एक प्रदेशमें जिस प्रकार एक परमाण का अवगाह होरहा है, तिसी प्रकार अनेक अरण अथवा अनेक स्कन्धों का भी सूक्ष्म परिणाम होजाने से अवगाह होजाता है और तिस प्रकार उन पुद्गलों का सम्पूर्ण रूप से वह एक प्रदेश प्रादि में होरहा अवगाह यथायोग्य प्रत्येक में विभाग प्राप्त कर लिया जानो अथवा प्रत्येक विभेद को प्राप्त होरहे पुद्गलों का सम्पूर्ण रूप से यथायोग्य एक प्रदेश आदि अवगाहस्थान हैं, उसो को सूत्रकार ने कहा है कि आकाश के एक प्रदेश, दो प्रदेश, संख्यात आदि प्रदेशों में पुद्गलों का अवगाह भजनीय है। तस्यैव लोकाकाशस्यैकप्रदेशे यथैकस्य परमाणारबगाहनमस्ति निर्वाध तथा द्वयादिसंख्येयानां स्कंधानामपि परमसौदम्यपरिणामानां । तद्वद्वयादिप्रदेशेषु च यथैकत्वपरिणामनिरुत्सुकानां द्वयादिपरमाणुनामवगाहस्तथा द्विव्यादिसंख्येयासंख्येयानन्तपरम णुमयस्कंधानामपि तादृशात् सौक्ष्म्यरिणामादित्यशेषतो यज्ञायोग प्रविभज्यतां । असंख्यात-प्रदेशी उस ही लोकाकाश के एक प्रदेश में जिस प्रकार एक परमाण का वाधा रहित होकर अवगाहन होरहा है, तिसी से प्रकार उस एक प्रदेश में दो, तीन, सौ, लाख, कोटि, संख्याते परमारणों और स्कन्धों का भी परमसूक्ष्मपन परिणामवालों का अवगाह होरहा है, असंख्याते और अनन्ते भी परमाणों और स्कंधों का अवगाह है। और उस तीन, आदि प्रदेशों में जिस प्रकार एकत्व परिणति के उत्सूक नहीं होरहे दो, तीन, संख्यात, असंख्यात, आदि अबद्ध परमाणों का अवगाह है, तिसी प्रकार उन दो आदि प्रदेशों में दो, तीन, पचास. हजार, खर्व, संख्यात, असंख्यात, अनन्ते, परमाणों से तादात्म्य रखते हुये तन्मय होरहे स्कन्धों का भी अवगाह होना समझ लिया जाय, उन परमाणोंके ही समान तिसी जातिके सूक्ष्मपन परिणाम से पुद्गल का अशेष रूप से यथायोग्य होरहे अवकाशकी अच्छी विकल्पना कर ली जाओ, कोई विरोध नहीं आता है। न च पुद्गलस्कंधानाम् तादृशसौम्यपरिणामोऽ सद्धः स्थूलानामपि शिथिलावयवकसिपिंडादीनां निविडावयवदशायां सौम्यदर्शनात, कूष्मांडमातुलुगविल्यामलकवदिरसौम्यतारतम्यदर्शनाच्च क्वचित्कामणस्कंधादिषु परममोदम्यानुमानात् महत्त्वतारतम्यदशनात् कचित्परममहत्वानुमानवत् ।
SR No.090500
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 6
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1969
Total Pages692
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size23 MB
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