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________________ तत्त्वार्थचिन्तामणिः भवप्रत्यय ही अवधिज्ञान देवनारकियोंके होता है । इस प्रकार दूसरा पूर्वदलमें नियम कर देनेसे देव और नारकियोंके गुणसे उत्पन्न हुए क्षयोपशमनिमित्त अवधिज्ञानका निषेध हो जाता है। क्योंकि देव और नारकियोंके सदा अप्रत्याख्यानावरण कर्मका उदय बना रहनेके कारण संगम, देश. संयम और श्रेणी आदिके भावस्वरूप गुणोंका अभाव है । अतः उन शरीरधारी देवनारकियोंके गुणप्रत्यय अवधिज्ञान नहीं उपजाता है। .. नन्वेवमधारणेऽवधौ ज्ञानावरणक्षयोपशमहेतुरपि न भवेदित्याशंकामपनुदति । यहां किसीका प्रश्न है कि इस प्रकार देवनारकियोंके अवधिबानमें भवप्रत्ययका ही यदि अव. धारण किया जायगा, तब तो ज्ञानावरणका क्षयोपशम भी उस अवधिज्ञानका हेतु नहीं हो सकेगा? किंतु सम्पूर्ण ज्ञानों में क्षयोपशम या क्षयको तो अनिवार्य कारण माना गया है। अवधारण करनेपर तो उस क्षयोपशमकी कारणता पृथग्भूत हो जाती है । इस प्रकार आशंकाका श्री विद्यानंदस्वामी वार्तिकोंद्वारा स्वयं निराकरण करते हैं। नावधिज्ञानवृत्कर्मक्षयोपशमहेतुता। व्यवच्छेद्या प्रसज्येताप्रतियोगित्वनिर्णयात् ॥५॥ बाह्यो हि प्रत्ययावत्राख्यातौ भवगुणौ तयोः। प्रतियोगित्वमित्येकनियमादन्यविच्छिदे ॥६॥ " भवप्रत्यय एव " ऐसा कहदेनेसे अवधिज्ञानावरण कर्मके क्षयोपशमको अवधिज्ञानकी हेतुताका व्यवच्छेद हो जाना यह प्रसंग कथमपि प्रस्तुत नहीं होगा। क्योंकि क्षयोपशमको अप्रतियोगीपनका निर्णय हो चुका है । अवधारण द्वारा विपक्षभूत प्रतियोगियोंका निवारण हुआ करता है । भावार्थ-भवप्रत्ययका प्रतियोगी भवप्रत्ययाभाव या संयम आदि गुण हैं। अतः भवप्रत्यय ही ऐसा अवधारण करनेपर मवप्रत्यपाभावका ही निवारण होगा । क्षयोपशमकी कारणताका बालाग्र मात्र भी व्यवच्छेद नहीं हो सकता है। कारण कि उन दो प्रकारवाले अवधिज्ञानोंके बहिरंगकारण यहां प्रकरणमें भव और गुण ये दो वखाने गये हैं। अतः भव और गुण परस्परमें एक दूसरेके प्रतियोगी हैं। इस कारण शेष अन्यका व्यवच्छेद करनेके लिये एकका नियम कर दिया जाता है । अर्थात्-जिस देव या नारकीके भवको कारण मानकर अवधिज्ञान उत्पन हुआ है, भलें ही उनके अवधिज्ञानमें संयम आदि गुण कारण नहीं है, किन्तु क्षयोपशम तो कारण अवश्य है। गुण तो बहिरंगकारण है, और क्षयोपशम अन्तरंगकारण है । अतः भवके प्रतियोगी हो रहे बहिरंगकारण गुणका तो देव नारकियोंके अवधिज्ञानमें निषेध है। किन्तु अप्रतियोगी बन रहे क्षयोपशमका निषेध नहीं किया गया है ।
SR No.090498
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 4
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1956
Total Pages598
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size17 MB
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