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________________ तत्वार्थ लोकवार्तिके बहुविध तथा उनसे इतर अल्प और अल्पविध इनमें परस्पर भेद सिद्ध है । भेद, प्रभेदसहित अनेक प्रकार कैई जातिके घोडोंका जो ग्रहण है, वह बहुविधका ग्रहण है । एक प्रकार के अनेक घोडोंका ग्रहण एकविधका अवग्रइ है । एक दो घोडेका ज्ञान अबहुका अवग्रह है। कैई घोडे, अनेक बैल, कतिपयमहिष आदिका समूहालम्बनज्ञान भी बहुविधका अवग्रह समझा जायगा । ४७६ एवं बहेकविधयोरभेद इत्यपास्तं बहूनामप्यनेकानामेकप्रकारत्वं ह्येकविधं न पुनर्बहुत्वमेवेत्युदाहृतं द्रष्टव्यम् । इस प्रकार बहुत और एकविधका अभेद है, यह शंका भी दूर कर दी गयी समझ लेना चाहिये | क्योंकि भिन्न भिन्न जातिके एक एक पदार्थोंको एकत्रित कर बहुतपना हो सकता है । किन्तु एकविधपना तो एक जातिके अनेक पदार्थोंका ही होगा । अतः बहुत भी एक जातिके अनेकों का एक प्रकारपना एकविध कहा जाता है । किन्तु वहां फिर बहुतपनेका व्यवहार नहीं करना चाहिये। इस प्रकार उदाहरण दिया जा चुका देख लेना चाहिये । क्षिप्रंस्याचिरकालस्याध्रुवस्य चलितात्मनः । स्वभावैक्यं न मंतव्यं तथा तदितरस्य च ॥ ६ ॥ शीघ्रकालके क्षिप्रका और चलितखरूप हो रहे अध्रुवका स्वभाव एकपना नहीं मानना चाहिये तथा उनसे इतर अक्षिप्र और ध्रुवका भी स्वभाव एक नहीं है, इनमें मोटा अन्तर विद्यमान है । अचिरकालत्वं ह्याशुप्रतिपत्तिविषयत्वं चळितत्वं पुनरनियतप्रतिपत्तिगोचरत्वमिति स्वभावभेदात् क्षिप्राध्रुवयोर्नैक्यमवसेयं । तथा तदितरयोरक्षिप्रध्रुवयोस्तत एव । अचिरकालपना तो शीघ्र ही प्रतिपत्तिका विषय हो जानापन है । और चलितपना तो फिर नहीं नियत ( स्थिर ) हो रहे पदार्थ की प्रतिपत्तिका विषयपना है। इस प्रकार स्वभावके भेद होनेसे क्षिप्र और अधुत्रका एकपना नहीं निर्णीत कर लेना चाहिये । अर्थात् - क्षिप्र ही अधुत्र नहीं है । तथा उनसे विपरीत अक्षिप्र और ध्रुवका भी तिस ही कारण यानी देरसे प्रतीति कराना और स्थिर प्रतिपत्ति कराना, इन स्वभावभेदों के होनेसे उनका एकपना नहीं जान लेना चाहिये । निःशेषपुगौद्गत्यभावाद्भवति निःसृतः । स्तोक पुद्गलनिष्क्रांतेरनुक्तस्त्वाभिसंहितः ॥ ७ ॥ निष्क्रांतो निःसृतः कात्स्यदुक्तः संदर्शितो मतः । इति तद्भेदनिर्णीतेरयुक्तैकत्वचोदना ॥ ८ ॥
SR No.090497
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 3
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1953
Total Pages702
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size21 MB
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