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________________ तत्त्वार्थचिन्तामणिः किन्तु मतिज्ञान तो ऐसा श्रुतके सदृश नहीं है, तर्कस्वरूप अथवा स्वार्थानुमामस्वरूप भी उस मतिज्ञानमें सबसे बड़े मतिज्ञानको तिसप्रकार श्रुतज्ञानके समान सर्व तत्त्वोंका ग्राहकपना नहीं है, जिस प्रकार अनन्त व्यंजनपर्यायोंसे चारों ओर घिरे हुये संपूर्ण द्रव्योंको श्रुतज्ञाम ग्रहण करता है। तिस प्रकार मतिज्ञान नहीं जानता है । अपने जैनमतके सिद्धान्तमें वर्ण, रस, संस्थान, आदि मोटी मोटी थोडीसी पर्यायोंसे विशिष्ट हो रहे द्रव्यको विषय करनेपनसे इस मतिज्ञानकी प्रतीति हो रही है । अतः अपने मतसे विरोध भी आता है । क्योंकि उसका दूसरे प्रकार ही व्याख्यान द्वारा अवतार है। उन मति और श्रुत दोनोंके केवल असर्व पर्याय और द्रव्योंको विषय करनापन ही अपने सिद्धान्तमें प्रसिद्ध हो रहा है। किंतु फिर दोनोंको अनन्त व्यंजनपर्याय और सम्पूर्ण द्रव्योंको विषय करलेनापन नहीं माना गया है । यानी अकेला श्रुतज्ञान ही अनन्त व्यंजनपर्यायोंसे सहित सम्पूर्ण द्रव्योंको जान सकता है। इस प्रकार उस सूत्रका व्याख्यान करना भी अविरुद्ध ही पडता है। क्योंकि कोई बाधक प्रमाण नहीं है । इस कारण विषयका अभेद होना उन मति, श्रुतज्ञानोंके एकपनका साधक नहीं है। कहां समुद्र और कहां सरोवर । इंद्रियानिद्रियायत्तवृत्तित्वमपि साधनम् । न साधीयोप्रसिद्धत्वाच्छ्रतस्याक्षानपेक्षणात् ॥३१॥ __मतिज्ञान और श्रुतज्ञानका अभेद सिद्ध करनेके लिये दिया गया बहिरंग इन्द्रिय और अन्तरंग इन्द्रियके अधीन होकर प्रवर्तना रूप हेतु भी अधिक अच्छा नहीं है। क्योंकि पक्षमें नहीं रहनेके कारण सुलभतासे असिद्ध हेत्वाभास है । श्रुतज्ञानको स्पर्शन आदि बहिरंग इंद्रियोंकी कथमपि अपेक्षा नहीं है। यों परम्परासे विचारा जाय तब तो मोक्षको बंधकी अपेक्षा है। अन्न, फलं, आदि भक्ष्य पदार्थोको अभक्ष्य मलमूत्र युक्त खातकी अपेक्षा है । प्रकाशको अन्धकारकी अपेक्षा है। वस्तुतः न्यायशास्त्रकी दृष्टिसे देखा जाय तो परम्परासे कारण पडनेवाले पदार्थोको प्रकृत कार्यका कारणपना ही प्राप्त नहीं है । पितामह [ बाबा ] अपनी पौत्री [ नातिनी ] को बेटी कह देता है। किंतु पुत्रवधूको स्वपत्नी कहनेसे महान पापका भागी होकर लोकनिंद्य हो जायगा । भाइयो । लोकप्रसिद्ध स्थूलव्यवहारके अनुसार सूक्ष्मकार्य कारणभावको न घसीटों। मतिश्रुतयोरेकत्वमिंद्रियानिद्रियायत्तवृत्तित्वादित्यपि न श्रेयः साधनमसिद्धत्वात् । साक्षादक्षानपेक्षत्वाच्छूतस्य, परंपरया तु तस्याक्षापेक्षत्वं भेदसाधनमेव साक्षादसाक्षादक्षापेक्षयोविरुदधर्मध्याससिः ॥ ___मतिज्ञान और श्रुतज्ञान [ पक्ष ] में एकपनाही है। ( साध्य ) इन्द्रिय और मनके अधीन होकर प्रवृत्ति करनेवाले होनेसे ( हेतु ) अर्थात् मतिज्ञान और श्रुतज्ञान दोनोंके कारण इन्द्रिय
SR No.090497
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 3
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1953
Total Pages702
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size21 MB
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