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________________ तत्वार्थ लोकवार्तिके समाप्ति (घेरा) करदेना और तिससे मति, श्रुत, आदि सबका समूह एक ज्ञान है यह अनिष्ट अर्थ निवृत्त करा दिया जाय । १४ कुतोयमर्थोनिष्टः ? केवलस्य मत्यादिक्षयोपशमिकज्ञानचतुष्टयांसंपृक्तस्य ज्ञानत्ववि रोधात् । मत्यादीनां चैकशः सोपयोगानामुक्तज्ञानांतरासंपृक्तानां ज्ञानत्वव्याघातात् तस्य प्रतीतिविरोधाच्चेति निश्चीयते । कोई जैनोंसे पूंछता है कि पांचोंको मिला करके एक ज्ञानपना हो जाना यह अर्थ जैनोंको किस कारण से अनिष्ट है ? बताओ । इसका उत्तर श्री विद्यानन्द आचार्य कहते हैं कि प्रतिपक्षी कर्मोंके क्षयोपशम से उत्पन्न हुये मति, श्रुत, अवधि, और मन:पर्यय इन चारों ज्ञानोंके साथ नहीं सम्पर्क रखनेवाले केवलज्ञानको ज्ञानपनेका विरोध होगा, अर्थात् - छठमेंसे लेकर बारहवें गुणस्थान तक किसी एक मुनिमहाराजके चारों ज्ञान लब्धिरूपसे एक समयमें भलें ही हो जांय, किन्तु ज्ञानावरणके क्षय होनेपर उत्पन्न हुये केवलज्ञानका उक्त चारों ज्ञानसे साहचर्य नहीं है । केवलज्ञान तो 1 केवल ही रहेगा । जिन चारों ज्ञानोंमें देशघाति प्रकृतियोंके उदयको कारणता प्राप्त है, ज्ञानावरणके सर्वथा क्षय हो जानेपर तेरहवें गुणस्थानके आदिमें उत्पन्न हुआ केवलज्ञान भला उसकी सहयोगिता कर भी कैसे सकेगा ? कहना यह है कि उपयोगस्वरूप मति आदि चार ज्ञान भी तो एक समयमें नहीं पाये जासकते हैं, अतः उन चारोंको भी मिलाकर एक ज्ञानपना असम्भव है । लब्धिरूप नहीं किन्तु उपयोग सहित हो रहे मति, श्रुत आदि एक एक ज्ञानका जो कि कहे हुये उपयोग सहित अन्य श्रुत आदिसे अछूते हो रहे हैं उनको ज्ञानपनेका व्याघात हो जावेगा तथा मति आदिक एक एकको जव ज्ञानपना प्रतीत हो रहा है तो समुदितको एक ज्ञानपनेका प्रतीतियोंसे विरोध है ऐसा निश्चय किया। जा रहा है। एक समय में दो उपयोग नहीं होते हैं। हां, ज्ञानोंकी चार और दर्शनोंकी तीन इस प्रकार सात लब्धियां किसी मुनि महाराजके भलें ही हो जायें, मनः पयर्यको छोडकर छह लब्धियां तो नारकी और पशुओं के भी पाई जा सकती हैं । किन्तु उपयोग तो अकेले मतिज्ञानके भी दो रासनप्रत्यक्ष या स्पर्शन प्रत्यक्ष एक समयमें नहीं होते हैं । भुरभुरी कचौडीके खानेपर भी उपयोगस्वरूप पांच ज्ञान क्रमसे ही होते हुए माने गये हैं । अवग्रह ईहा आदि भी आत्मामें क्रमसे उपजते हैं । किं मतिश्रुतावधिमनः पर्यय केवलान्येव ज्ञानमिति पूर्वावधारणं द्रष्टव्यं तानि ज्ञानमेवेति परावधारणं वा तदुभयमविरोधादित्याह । यहां प्रश्न है कि इस सूत्र में मति, श्रुत, अवधि, मन:पर्यय और केवल ये ही ज्ञान हैं । इस प्रकार क्या उद्देश्यदलके साथ पहला अवधारण देखना चाहिये ? अथवा वे मति आदिक ज्ञान ही हैं ? क्या इस प्रकार उत्तर विधेयदलमें एव लगा कर अवधारण करना आवश्यक है ? आप जैनोंने पहले ही कह दिया है कि जिन वाक्योंमें एवकार नहीं भी दीखे उनमें भी उपरिष्ठात् देख
SR No.090497
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 3
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1953
Total Pages702
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size21 MB
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