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________________ तत्त्वार्यचिन्तामणिः विसदृशानां भावो हि वैसादृश्यं तच पदार्थेभ्यो भिन्नमभिन्नं भिन्नाभिन्नं वा स्यादतोऽन्यगत्यभावात् । सर्वथा सादृश्यपक्षभावी दोषो दुर्निवार इति कृतस्तत्सिद्धिः । २४१ विलक्षण पदार्थों का भाव वैसादृश्य माना गया है और वह विसमानता विलक्षण पदार्थोंसे भिन्न है ? या अभिन्न है ? अथवा भिन्न अभिन्न है ? बताओ । इससे अन्य कोई गति नहीं, यानी कोई उपाय नहीं है । इन तीनों पक्षोंमें वे ही सादृश्यके पक्ष में लागू होनेवाले दोष सभी प्रकार कठिनता से भी नहीं हटाये जा सकते हैं। इस प्रकार बताओ, उस वैसादृश्य की सिद्धि कैसे होगी ? अर्थात् विभिन्न पदार्थोंमें पडी हुई विसमानता यदि उनसे सर्वथा भिन्न है तो " यह उनकी है " यह व्यवहार सर्वथा भेदपक्ष में नहीं हो सकता है। संबंध मानोगे तो सर्वथा भिन्न पडे हुये विसमान पदार्थ और वैसादृश्यका समवाय बौद्धोंने समवायको माना भी नहीं है । तादात्म्य संबंध माननेपर उठानेसे पूर्वोक प्रकार वैसादृश्य बहुत्व और अनवस्था नामके विशदृश अर्थोके सर्वथा अभेद माननेपर पदार्थोंके एक हो जानेका प्रसंग है । भिन्न अभिन्न पक्षमें विरोध आदिक दोष लगेंगे । इस प्रकार बौद्धोंके यहां विशदृशपने की भी सिद्धि नहीं हो सकेगी । संबंध तो नहीं सम्भावता है । पूर्णदेश और एकदेशका विकल्प दोष आते हैं। वैसादृश्य और सादृश्यद्वैसादृश्यमपि न परमार्थमर्थक्रियाशून्यत्वात् स्वलक्षणस्यैव सत्त्वस्य परमार्थत्वात् तस्यार्थक्रिया समर्थत्वादिति चेत् 1 बौद्ध कहते हैं कि चलो अच्छा हुआ, हम तो सादृश्यके समान वैसादृश्यको भी वास्तविक नहीं मानते हैं । क्योंकि विसदृशपना किसी भी अर्थक्रियाको नहीं करता है । सदृशविशदृशपने से रहित स्वलक्षणका तत्व ही अनेक अर्थक्रियाओंके करने में समर्थ है। इस प्रकार कहनेपर तो आचार्य महाराज उत्तर देते हैं । न वैसादृश्यसादृश्यत्यक्तं किंचित्स्वलक्षणं । प्रमाणसिद्धमस्तीह यथा व्योमकुशेशयं ॥ ८२ ॥ वैसादृश्य विशेष ) और सादृश्य ( सामान्य ) से रहित हुआ कोई भी बौद्धों का माना हुआ स्वलक्षण यहां प्रमाणोंसे सिद्ध नहीं है। जैसे कि आकाशका कमल सामान्यविशेषोंसे रहित होता हुआ प्रमाणसिद्ध नहीं है, यानी असत् है । प्रत्यक्ष संविदि प्रतिभासमानं स्पष्टं स्वलक्षणमिति चेत् बौद्ध कहते हैं कि स्वलक्षण तो प्रत्यक्षज्ञान में स्पष्टरूपसे प्रतिभास रहा है। ऐसा कहनेपर तो आचार्य उत्तर देते हैं कि 81
SR No.090497
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 3
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1953
Total Pages702
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size21 MB
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