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________________ १७८ तत्त्वार्यश्लोकवार्तिके वह उसका साधक यां बाधक नहीं होता है । जैसे कि रूपको जाननेमें रसना इन्द्रियजन्य प्रत्यक्ष कथमपि साधक या बाधक नहीं है। तिस ही कारण यानी बाधकोंका असम्भव होनेसे ही वह सर्वज्ञ प्रत्यक्ष भला बाधकोंके नहीं संभव होनेके संदेहको प्राप्त भी नहीं है । यानी उसके बाधकोंके होनेका संदेह मात्र भी नहीं है । क्योंकि बाधकोंके असम्भवका पक्का निश्चय हो रहा है। न हि तादृशं प्रत्यक्षं किंचित्संभवद्भाधकमपरमसंभवद्भाधकं सिद्धं येनेदं संपतिसंदेहविषयतामनुभवेत् । कथं वात्यंतमसंदिग्धासंभवद्धाधकं नाम ? । नियतदेशकाळपुरुषापेक्षया निश्चितासंभवद्धाधकत्वेपि देशांतराद्यपेक्षया संदिग्धासंभवद्वाधकत्वमिति चेन्न, सुष्ठु तथाभावस्य सिद्धेः। यथाभूतं हि प्रत्यक्षादि प्रमाणमत्रत्येदानींतनपुरुषाणामुत्पद्यमानबाधकं केवलस्य तथाभूतमेवान्यदेशकालपुरुषाणामपीति कुतस्तद्धाधनं संदेहो वा यदि पुनरन्यादृशं प्रत्यक्षमन्यद्वा तद्भाधकमभ्युपगम्यते तदा केवळे को मत्सरः, केवलेनैव केवलबाधनसंभवात् । तिस प्रकारका अनुमानोंसे निर्णीत कर दिया गया सकल प्रत्यक्ष कोई तो बाधकोंके संभववाला और दूसरा कोई प्रत्यक्षप्रमाण बाधकोंकी संभावनासे रहित ऐसा सिद्ध नहीं हो रहा है । जिससे कि यह प्रत्यक्ष इस समय संदेहके विषयपनका अनुभव करता । यानी सामान्य धर्मोका कहीं अन्यत्र उपलब्ध हो जानेपर उनका स्मरण करते हुये पुरुषको किसी दूसरे स्थलपर संशय हो सकता है । अन्यथा नहीं । प्रकरणमें बाधक प्रमाणोंके नहीं होनेका संदेह होना नहीं सम्भवता है । कोई पूछता है कि सर्वज्ञके प्रत्यक्षमें बाधकोंके अत्यन्तरूपसे, असंभव होनेका, संदेहरहितपना भला तुमने कैसे जाना ? बताओ। नियत हो रहे परिदृष्ट देश और वर्तमान काल तथा स्थूलबुद्धि साधारण पुरुषोंकी अपेक्षासे भले ही बाधकोंके असम्भवका निश्चय कर लिया गया होय तो भी अन्य देश अन्य काल और असाधारण बुद्धिवाले पुरुषोंकी अपेक्षासे बाधकोंके असम्भवका संदेह प्राप्त हो रहा है । अमेक पदार्थ ऐसे हैं कि इस देशमें उनमें संदेह नहीं है। किन्तु देशान्तरमें संदेह हो जाता है। देखो ! इस देशमें शीशोंकी बेलि नहीं होती है। किन्तु देशान्तरमें शीशोंकी बोल सम्भावित है। अतः शीशोंके वृक्षपनके बाधक प्रमाणोंका असम्भव देशांतरमें संदिग्ध हो गया। विवक्षित कालमें आम खट्टा होता है, किन्तु कालान्तरमें मीठा हो जाता है । सुगन्धित पुष्प कालान्तरमें सडकर दुर्गन्धी हो जाता है । यहां भी सुगंधिक बाधक प्रमाणोंके अभावका कालान्तरमें संदेह हो गया । एक रागी पुरुषको धन, पुत्र, आदिमें इष्टपनेका ज्ञान हो रहा है । किन्तु उदासीन पुरुषको इष्टताका ज्ञान नहीं है । अतः तटस्थ पुरुषको उसकी इष्टताका संदेह है। इस कारण देशान्तर आदिकी अपेक्षा सर्वज्ञप्रत्यक्षमें भी बाधकोंकी असम्भवताका संदेह होना संभावित है। अब ग्रंथकार कहते हैं कि सो यह प्रश्न तो नहीं करना । क्योंकि केवलज्ञानमें बहुत अच्छी तिस प्रकार बाधकोंके अस
SR No.090497
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 3
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1953
Total Pages702
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size21 MB
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