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________________ तत्त्वार्थचिन्तामणिः ___ इस उक्त अनुमानमें पक्ष असिद्ध है, यह तो न कहना। क्योंकि वादी प्रतिवादी दोनोंसे सिद्ध किया जा चुका, प्रत्यक्षप्रमाण यहां धर्मी है । हां, वह किन्ही योगियोंका प्रत्यक्ष सम्पूर्ण पदार्थीको युगपत् विषय करनेवाला है, क्रमरहित है, और इन्द्रियोंकी अधीनतासे अतिक्रान्त है, इस प्रकार धर्मोसे युक्तपने करके साधा जारहा है । क्योंकि उसका निर्दोषपना दूसरे प्रकारोंसे नहीं बन सकता है । जो स्वांशमें निर्दोष होता है, वह पराधीन न होकर सबको युगपत् विषय कर लेता है। यहां अकलंकपना हेतु असिद्ध नहीं है । यानी हेतु पक्षमें ठहर जाता है। पूर्व प्रकरणोंमें हम उसको साध चुके हैं। प्रत्येक नियत पदार्थके ज्ञानको रोकनेवाले ज्ञानावरण कर्मके क्षयोपशमको कारण मानकर उत्पन्न हुआ विज्ञान दीपकके समान प्रत्येक नियत पदार्थोको विषय कर रहा है । किन्तु सम्पूर्ण ज्ञानावरणके अनन्तकालतक क्षय हो जानेसे उत्पन्न हुआ केवलज्ञान तो सूर्यके प्रकाश समान सम्पूर्ण पदार्थोको विषय करनेवाला सिद्ध हो ही जाता है । तिस ही कारण यानी सम्पूर्ण ज्ञानावरणके क्षय हो जानेसे ही वह ज्ञान क्रमसे पदार्थोको जाननेवाला नहीं है। किन्तु युगपत सम्पूर्ण पदार्थोको जान लेता है । अल्पज्ञोंके आवरणरूप कलंकोंका दूर होना क्रमसे हो रहा था। इस कारण हम लोगोंका ज्ञान नियत अर्थोको जाननेवाला क्रमसे किया जाता है । अतः छमस्थोंका ज्ञान क्रमवाला है। किन्तु पूज्य पुरुषोंके जब युगपत् उस आवरणका विध्वंस हो गया है, तो फिर ज्ञानका क्रम किससे होगा ! कारणके न होनेपर कार्य नहीं होता है । अतः सर्वज्ञका प्रत्यक्ष क्रमरहित है । सर्वको युगपत् जानता है । और फिर भूतभविष्यपनेके तारतम्यको विशेषण लगाकर उसी ढंगसे पदार्थोकी नवीन इप्ति अनन्त कालतक. करता रहता है। करणक्रमादिति चेन्न, तस्य करणातीतत्वात् । देशतो हि ज्ञानमविशदं चाक्षमनोपेक्षं सिदं न पुनः सकलविषयं परिस्फुटं सदुपजायमानमिति । न चैवंविधं ज्ञानं प्रत्यक्ष संभवब्दाधकं प्रत्यक्षादेरतद्विषयस्य तदाधकत्वविरोधात् । तत एव न संदिग्धासंभवद्भाधकं, निश्चितासंभवद्भाधकत्वात् । कोई कहे कि इन्द्रियोंकी प्रवृत्ति क्रमसे होती है । अतः सर्वज्ञका ज्ञान भी क्रमसे पदार्थीको जानेगा । ग्रन्थकार कहते हैं कि सो यह तो न कहना। क्योंकि वह केवलज्ञान करणोंसे अतिक्रान्त है । जो ज्ञान एकदेशसे विशद है या सर्वथा अविशद है, वही इन्द्रिय और मनकी अपेक्षा रखनेवाला सिद्ध है। किन्तु जो ज्ञान फिर सम्पूर्ण विषयोंको एक ही समयमें अधिक स्पष्टरूपसे विषय करनेवाला उत्पन्न हो रहा है, वह तो बहिरंग अंतरंग इन्द्रियोंकी अपेक्षा नहीं करता है। इस प्रकार अकलंकपनेसे करणातीतपनकी और करणातीतपनसे अक्रमपनकी और अक्रमपनसे अशेषगोचरपनेकी सर्वज्ञज्ञानमें सिद्धि हो जाती है । तथा इस प्रकारका कोई प्रत्यक्षज्ञान बाधकोंकी संभापनासे युक्त नहीं है । क्योंकि उस सर्वज्ञपनको नहीं विषय करनेवाले प्रत्यक्ष, अनुमान आदिक प्रमाणोंको तो उसके बाधकपनका विरोध है । जो ज्ञान जिस विषयमें प्रवृत्ति ही नहीं करता है। 28
SR No.090497
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 3
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1953
Total Pages702
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size21 MB
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