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________________ तलायचिन्तामणिः wwwwwwwwwwwwwww देखो, सूर्यको हजारों योजनतक सम्पूर्ण जगत् मण्डलका प्रकाश करनेमें कोई दूसरा भिन्न पदार्थ करण आकांक्षणीय नहीं है। यदि उस सूर्यका उस मण्डलका प्रकाश करनेमें प्रकाशको करण माना जायगा तब तो हम पूछते हैं कि वह प्रकाश उस सूर्यसे मिन तो नहीं है ! अन्यथा सूर्यको स्वयं गांठके प्रकाश रहितपनेका प्रसंग होगा। यदि सूर्यसे प्रकाश अमिन है तो स्वयं अपनेको करणपना सिद्ध हो गया । हम पहिले प्रकरणोंमें भी क से नहीं दिल होरहेकरणको कर्चाका स्वरूप बन गये का समर्थन कर चुके हैं, जैसे अग्नि उष्ण परिणामसे जला रही है। उर्ध्वगमन स्वभाव करके ऊपरको लौ उठ रही है। यहां अमिके उष्णता, अर्धगमनस्वभाव आदिक करण उस कर्तारूप अग्निसे अभिन्न है । इस कारण सर्वथा अपनेसे भिन्न न्यारे करणको कारण मानकर योगीका ज्ञान उत्पन्न नहीं होता है, और योगीका ज्ञान करणके विना ही उत्पन्न हो जाय यह भी नहीं है, जिससे कि वह इन्द्रिय जन्य माना जाय या पूर्व उक अदृष्टकी कल्पना करना सम्भावित होय । भावार्य-कर्तासे अभिन्न करणवाले केवलज्ञान द्वारा इन्द्रिय, संनिकर्ष, आदिके विना ही सम्पूर्ण अर्थाका शान हो जाता है। येत्वाहुः, इन्द्रियानिद्रियपत्यक्षपतींद्विपत्यक्षं चाक्षाश्रितं क्षीणोपशांतावरणस्य क्षीणावरणस्य चात्मनोऽक्षशब्दवाच्यत्वादनुमान लिंगापेक्षं शद्वापेक्षं श्रुतमिति प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि व्यवतिष्ठते अक्षादिसामग्रीभेदादिति तेषां स्मृविसंज्ञाचिताना प्रत्यक्षत्वप्रसंग: क्षीणोपशांतावरणात्मलक्षणमक्षमाश्रित्योत्पत्तेः लिंगशदानपेक्षत्वाच्च ।। किन्तु जो वादी ऐसा कह रहे हैं कि इन्द्रिय प्रत्यक्ष, और मानस प्रत्यक्ष, तथा योगियोंका अतींद्रिय प्रत्यक्ष, ये सभी प्रत्यक्ष ज्ञान भला अक्षका आश्रय लेकर उत्पन्न हुये हैं। क्योंके ज्ञानावरणके क्षयोपशमको रखनेवाले और ज्ञानावरणके क्षयको रखनेवाले आत्माको अक्ष शब्दका वाध्य अर्थपना है । यानी " शब्दलिंगाधसामग्रीमेदात " यहां अक्षका अर्थ आत्मा लिया गया है । अतः अक्षकी अपेक्षा रखनेवाला प्रत्यक्ष और लिंगकी अपेक्षा रखनेवाला अनुमान तथा शब्दसामग्रीकी अपेक्षा रखनेवाला श्रुतज्ञान, इस प्रकार प्रत्यक्ष अनुमान और आगम ये तीन प्रमाण व्यवस्थित हो रहे हैं। क्योंकि अक्ष, लिंग, आदि सामग्री इनमें भिन्न भिन्न हैं । इस प्रकार उनके कहनेपर आचार्य आपादन करते हैं कि यों तो उनके यहां स्मरण, प्रत्यभिज्ञान और व्याप्तिज्ञान इनको भी प्रत्यक्षानेका प्रसंग होगा। क्योंकि मतिज्ञानावरण कर्मोके क्षयोपशमस्वरूप आत्मा नामके अक्षको लेकर इनकी उत्पत्ति हो रही है । लिंग तथा शब्दकी अपेक्षा न होनेसे अनुमान और श्रुतज्ञानमें स्मृति आदिका गर्भ हो नहीं सकेगा। महाशयजी! इनको आप अतिरिक्त प्रमाण मानते नहीं हैं। अतः स्मृति आदि परोक्ष ज्ञानोंको आपके कथन अनुसार आत्मारूप अक्षसे उत्पन्न होनेके कारण प्रत्यक्षपना आ जायगा, जो कि किसी भी वादीको इष्ट नहीं है।
SR No.090497
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 3
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1953
Total Pages702
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size21 MB
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