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________________ १४८ तत्वार्य लोकवार्तिक एक ही बारमें सम्पूर्ण अर्थोके साथ मनका संनिकर्ष होना यह अद्यापि नहीं देखे गये अर्थकी कल्पना करना तो वैसीकी वैसी अवस्थित है । अर्थात्-अणु मनके साथ संपूर्ण अर्थाका संनिकर्ष होना यह अदृष्ट अर्थकी कल्पना तुमने ही की है । संनिकर्षके विना तो असंख्य पदार्थोकी चक्षुसे, मनसे, तर्कसे, इप्तियां हो रही हैं। यदि तुम यों कहो कि एक ही समयमें सम्पूर्ण अर्थोका ज्ञान हो जाना अन्यथा यानी मनके साथ सम्पूर्ण अर्थाका संनिकर्ष हुये विना नहीं बन सकता है। अतः उस सर्व अर्थक संनिकर्षकी सिद्धि हो रही है। इस कारण यह अदृष्टकी कल्पना नहीं है । प्रन्थकार कहते हैं कि सो तो न कहना। क्योंकि अन्य प्रकारोंसे भी उस साक्षात् एक ही बार सम्पूर्ण अर्थीका ज्ञान हो जानेकी सिद्धि हो जाती है। नैयायिकोंके मत अनुसार त्रिलोक त्रिकालवी, ब्यापक, नित्य, आत्माके साथ अर्थका संनिकर्ष मात्र हो जानेसे ही उस सम्पूर्ण अर्थोके ज्ञान हो जानेकी उपपत्ति है । अथवा आत्मा, मन, इन्द्रिय और अर्थका संनिकर्ष हुये विना मी केवल आत्मा करके ही ज्ञानावरणका क्षय हो जानेपर सम्पूर्ण अर्थाका ज्ञान होना बन जाता है । तिस ही को स्पष्टकर अनुमान द्वारा कहते हैं । योगीका ज्ञान (पक्ष ) इन्द्रियोंके क्रमका उल्लंघन करता है ( साध्य ) । साक्षात् सम्पूर्ण अर्थोको जाननेवाला छान होनेसे (हेतु )। जो ज्ञान क्रमवती इन्द्रियोंके अनुक्रमका उलंघन नहीं करता है, वह ज्ञान तिस प्रकार सम्पूर्ण अर्थोको जाननेवाला नहीं है। जैसे कि हम सारिखे अल्पज्ञ जीवोंका ज्ञान ( व्यतिरेक दृष्टान्त ) । इस सिद्धान्तको हम युक्तिपूर्ण समझते हुये यथार्थ देख रहे हैं। . ____ अत एव करणाद्विना ज्ञानमिति दृष्टपरिकल्पनं प्रक्षीणकरणावरणस्य सर्वार्थपरिच्छित्तिः स्वात्मन एव करणत्वोपपत्तेश्च भास्करवत् । न हि भानोः सकल जगन्मंडलपकाशनोंतरं करणपस्ति । प्रकाशस्तस्य तत्र करणमिति चेत्, स ततो नातिरं । निःपकाशत्वापत्रीिरनोंतरमिति चेत्, सिदं स्वात्मनः करणवं समर्थितं च कर्तुरनन्यदविभक्तकरी करणममेरोष्ण्यादिवदिति नार्यातरकरणपूर्वकं योगिज्ञानं । नाप्यकरणं येन तदिद्रियजमदृष्टं वा कल्पितं संभवेत् । ... इस ही कारण करणके विना भी ज्ञान हो जाता है । यह स्वसंवेदन प्रत्यक्षमें देखे हुये तत्त्वकी ही कल्पना है । जिस आत्माके करणज्ञानको रोकनेवाले शानआवरणोंका प्रकृष्ट रूपसे क्षय हो गया है, उसको संनिकर्षके विना भी सम्पूर्ण अर्थोकी परिच्छित्ति हो जाती है। यहां करणका अर्थ प्रमितिका करण हो रहा प्रमाणज्ञान है । इन्द्रिय नहीं। दूसरी बात यह है कि अयोकी परिच्छित्ति करने तुम्हें करणज्ञान आवश्यक ही होय तो ज्ञानकी स्वकीय आत्माको ही करणपना बन सकता है। जैसे कि सूर्य समर्ग अर्थोके प्रकाशित करने में स्वयं ही करण है। यहां कर्तास मिन करणकी आकांक्षा नहीं है। सर्वथा स्वाधीन केवलज्ञानरूप करणको आवरण करनेवाले ज्ञानावरण पटलका प्रत्यय हो जानेपर सब ओर परिच्छिति ही होती रहती है। आत्माको अपनेसे न्यारे करणोंकी आवश्यकता नहीं हैं।
SR No.090497
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 3
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1953
Total Pages702
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size21 MB
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