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________________ ११० तस्वार्थश्लोकवार्तिके जाना जायगा । अन्यथा यांनी अनभ्यास दशामें दोनोंकी परतः ज्ञप्ति माननेपर तो उनको अपने एकान्तकी हानि हो जानेका यानी अपने पक्षके परित्याग करनेका प्रसंग होगा । स्वतः मानकर फिर परतः मान लेनेसे उनकी प्रतिज्ञा नष्ट हो जाती है । किन्तु ऐसा होता हुआ नहीं प्रतीत हो रहा है। अनभ्यासदशाके जलमें हुये जलज्ञान और वालू रेत या कांसोंमें हुये जलज्ञानको प्रमाणपना और अप्रमाणपना पर ( दूसरे ) कारणोंसे निर्णीत किया जाता है। उस समय अनभ्यास दशामें वह प्रमाणपन चाहे किसीके सत्य अर्थके अवबोधकपनको प्राप्त नहीं किया जा सकता है, जिससे कि अर्थके विपरीतपन या कारणोंमें उत्पन्न हुये दोषोंके ज्ञानसे शंका प्राप्त अप्रमाणपनका निराकरण होकर अपवादरहित हो जानेके प्रसंगसे उस ज्ञानको स्वतः ही प्रमाणपना ज्ञात हो जाय । तथा अनभ्यास दशामें वह अप्रमाणपन किसी अर्थके मिथ्याप्रकाशकपनको भी प्राप्त नहीं कराया जा सकता है, जिससे कि अर्थके यथार्थ आत्मकपन या कारणोंमें उत्पन्न हुये गुणोंके ज्ञानसे शंका प्राप्त प्रमाणपनका निवारण कर अपवादरहित हो जानेसे उस ज्ञानको अप्रमाणपना स्वतः ही औत्सर्गिक जाना जाता, अर्थात् -अनभ्यास दशामें अपवाद विषयोंको टालकर स्वतः ही दोनों नहीं जाने जा सकते हैं । और तिस प्रकार होनेपर विषय अर्थके विपरीतपनका अभावज्ञान तो अप्रमाणपनेका बाधक नहीं सिद्ध हो सके और ज्ञेय अर्थ के विपरीतपनका ज्ञान प्रमाणपनका बाधक नहीं सिद्ध हो सके, यानी अर्थका यथार्थपन और विपरीतपन उन अप्रमाणपन और प्रमाणपनेके वहां बाधक हो जायंगे। उनके दूर करनेके लिये अन्य ज्ञापकोंकी आवश्यकता पड जायगी । न चानभ्यासे ज्ञानकारणेषु दोषाभावो गुणाभावो वा गुणदोषस्वभावः स्वतो विभा. व्यते यतो जातपात्रस्यादुष्टा दुष्टा वा नेत्रादयः प्रत्यक्षहेतवः सिध्येयुः धूमादितदाभासा वा अनुमानहेतवःशद्वतदाभासा वा शादज्ञानहेतवः प्रमाणांतरहेतवो वा यथोपवर्णिता इति। दूसरी बात यह है कि अनभ्यासकी दशा उपस्थित होनेपर ज्ञानके कारणोंमें दोषोंका अभाव अथवा गुणोंका अभाव जो कि गुण या दोषस्वरूप है, स्वतः तो नहीं विचार किया जा सकता है, जिससे कि यों कह दिया जाय कि उसी समय उत्पन्न हुये बच्चेतकके भी नेत्र आदिक दोष रहित अथवा दोषसहित जाने जाकर होते हुये वे प्रत्यक्षके प्रमाणपन और अप्रमाणपनके कारण सिद्ध हो जावें अथवा निर्दोष धूम आदिक हेतु और सदोष हेत्वाभास ये अनुमानके प्रमाणपन और अप्रमाणपनके कारण सिद्ध हो जाय अथवा निर्दोष शब्द और सदोष शद्वाभास ये आगमज्ञानके प्रमाणपन एवं अप्रमाणपनके कारण सिद्ध हो जाय अथवा आपने जिस प्रकार अन्य प्रत्यभिज्ञान, अर्थापत्ति, आदि प्रमाणोंके हेतु वर्णन किये हैं, वे निर्दोष और सदोष होते हुये उनके प्रमाणपन और अप्रमाणपनके हेतु सिद्ध हो जाय । भावार्थ -अनभ्यास दशामें निर्दोष और सदोष कारणोंका जानना बडा कठिन है । नील आभावाले जलको स्वच्छ कहा जाता है । जिस कपडेमें धोबी थोडा नील रंग लगा लाता है, वह कपडा स्वच्छ धुला हुआ समझा जाता है । और स्वच्छ धुला हुआ
SR No.090497
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 3
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1953
Total Pages702
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size21 MB
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