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________________ तत्वार्थचिन्तामणिः जिस प्रकार मीमांसक लोग जो अर्थके अन्यथापनके अभावके ज्ञानको ही अर्थके यथार्थपनका विज्ञानरूप कह रहे हैं, और वही अप्रमाणपनका बाधक है । भावार्थ-अर्थका विपरीतपन तो अप्रमाणग्नेको उत्पन्न कराता है। और उसका अभाव स्वतः प्रामाण्य उत्पन्न हो जानेका प्रयोजक हो जाता है । अन्यथापनके अभावका ज्ञान कोई न्यारा स्वतंत्र हेतु नहीं है । जिससे कि हुआ प्रमाणपना परसे उत्पन्न हुआ कहा जाय, किन्तु अर्थके विपरीतपनका अभाव जानना ही तो अर्थ के यथार्थपनका जानना है । अतः वह अर्थके अन्यथापनसे उत्पन्न होनेवाले अप्रमाणपनका बावक होकर ज्ञानमें स्वतः प्रमाणपना धर देता है । अप्रमाणपनको टालनेके लिये ही अन्य कारणकी आवश्यकता है । प्रमाणपना तो स्वतः प्राप्त हो जाता है । जैसे कि रोगको दूर करनेके लिये औषधिकी आवश्यकता है । पुनः शरीर प्रकृतिमें चंचलता, स्फूर्ति तो स्वयं आ जाती है । प्रन्थकार कहते हैं कि उसी प्रकार यह भी कहा जा सकता है कि अर्थके यथार्थपनके अभावका ज्ञान ही अर्थके अन्यथापनका विज्ञान है । वह प्रमाणपनेका अपवाद करनेवाला होकर विद्यमान सब ज्ञानोंके स्वतः अप्रमाणपनका व्यवस्थापक हो जाय । न्याय दोनों स्थानोंपर एकसा होना चाहिये। सज्जनताको स्वतः ही गर्भमेंसे ही चली आई मानकर दुर्जनताको बहिरंग कारणोंसे दूसरों द्वारा उत्पन्न हुई माननेवालोंके प्रति यह भी कहा जा सकता है कि दुर्जनता सभी जीवोंके जन्मसे ही अपने आप उत्पन्न हो जाती है । और पीछेसे सत्संग कर गुणोंके सीखनेसे दूसरों द्वारा सजनता उत्पन्न हो जाती है, ऐसा कहनेवालोंका मुख नहीं पकडा जा सकता है। अतः सजनता और दुर्जनता पीछेसे ही अन्य कारणोंसे उत्पन्न हुई मानना चाहिये । एकको उत्सर्गसे और दूसरीको अपवाद मार्गसे मानना अनुचित है । जल और स्थलमें एकसा बरसनेवाले मेघके समान न्याय एकसा होना चाहिये । विज्ञानकारणे दोषाभावः प्रज्ञायते गुणः । यथा तथा गुणाभावो दोषः किं नात्र मन्यते ॥ १०१ ॥ यथा च जातमात्रस्यादुष्टा नेत्रादयः स्वतः। जात्यंधादेस्तथा दुष्टाः शिष्टैस्ते किं न लक्षिताः ॥ १०२॥ प्रामाण्यको स्वतः उत्पन्न कहनेवाले मीमांसक जिस प्रकार यह कहते हैं कि विज्ञानके कारणोंमें जो गुण हैं, वे दोषाभाव स्वरूप हैं । भावार्थ-गुण कोई स्वतंत्र होकर न्यारा हेतु नहीं है। हां, बहिर्भूत कामल, तिमिर आदि स्वतंत्र दोष अवश्य हैं। उन दोषोंसे परतः अप्रामाण्य हो जाता है । किन्तु चक्षुमें जो निर्मलता आदि गुण कहे गये हैं, वे तो चक्षुका स्वरूप ( डील ) हैं। यानी चक्षुमें कोई दोष नहीं है । ऐसी दशामें प्रमाणपनेको अपवादरहित राजमार्ग प्राप्त हो जाता है । तिसी प्रकार हम जैन भी कह सकते हैं कि अप्रमाणपनेको उत्पन्न करनेवाले दोष कोई
SR No.090497
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 3
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1953
Total Pages702
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size21 MB
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