SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 561
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ५४८ तत्त्वार्यलोकवार्तिके परापेक्षाके साथ विरोधको समझता हुआ बौद्ध तो स्वयं निषेध करनेके लिये समर्थ नहीं हो सकता है क्योंकि कहीं न कहीं उस परपदार्थकी अपेक्षाकी सिद्धि हो चुकी है। अन्यथां विरोध होनेका अयोग है तथा पर अपेक्षाको नहीं निराकरण करता हुआ भी सर्व स्थलोंमें सम्बन्धकी अनापेक्षिकताका कैसे प्रत्याख्यान कर सकेगा ? और बलात्कारसे प्रत्याख्यान करेगा तो क्या वह उन्मत्त न समझा जायगा ? अर्थात् विक्षिप्त पुरुष ही परअपेक्षाको मानता हुआ अपेक्षा रखनेका खण्डन कर सकता है । अन्य नहीं। स्वलक्षणमेव सम्बन्धोऽनापेक्षिकः स्यान ततोऽन्यः स चेष्टो नाममात्रे विवादाद स्तुन्यविवादादिति चेत्, कः पुनः सम्बन्धमस्वलक्षणमाह तस्यापि स्वेन रूपेण लक्ष्यमाणस्य स्वलक्षणत्वात् । यदि बौद्ध यों कहें कि स्वलक्षण तत्त्व ही नहीं. अपेक्षा करता हुआ सम्बंध हो जायगा। उससे भिन्न " स्वस्वामि" आदि कोई भी सम्बन्ध नहीं है और वह स्खलक्षणरूप अनापेक्षिक सम्बन्ध हम बौद्धोंको भी इष्ट है। हमारे और आप जैनोंके माने गये पदार्थका केवल नाममें ही विवाद है। वस्तुतत्त्वमें विवाद नहीं है । इस प्रकार बौद्धोंके कहनेपर तो हम समझाते हैं कि कौन वादी विद्वान् सम्बन्धका स्वलक्षणरहित कहता है ? अर्थात् कोई नहीं । सम्पूर्ण पदार्थोंमें अपने अपने लक्षण स्वरूप गुथ रहे हैं वह संबन्ध भी स्वकीयरूप करके लक्ष्य करने योग्य होता हुआ स्वलक्षणस्वरूप है। " सर्व स्वलक्षणं स्वलक्षणं " भले ही कहे जाओ अच्छा है । ननु कुतः सम्बन्धस्तथा द्वयोः सम्बन्धिनोः सिद्धः ? एकेन गुणाख्येन संयोगेनान्येन वा धर्मेणान्तरस्थितेनावाच्येन वा वस्तुरूपेण सम्बन्धादिति चेत् स तत्सम्बन्धिनोरनर्थान्तरमर्थान्तरं वा ? यधनान्तरं तदा संबन्धिनावेव प्रसज्येते । तथा च न सम्बन्धो नाम। स ततोऽर्थान्तरं चेत् सम्बन्धिनौ केवलौ कथं सम्बद्धौ स्यातां तत्त्वान्यत्वाभ्यामवाच्यश्चेत् कथं वस्तुभूतः स्यात् । भवतु चामन्तरनर्थान्तरं वा सम्बन्धः । स तु द्वयोरेकेन कुतः स्यात् । परेणैकेन सम्बन्धादिति अनवस्थानात् । न सम्बन्धमतिः सदरमपि गत्वा द्वयोरेकाभिसंबन्धमन्तरेणापि सम्बन्धत्वे कथं नाभिसम्बन्धत्वमतिः केवलयोः सम्बन्धिनोरतिप्रसंगात् । यदि सम्बन्धश्च स्वेनासाधारणेन रूपेण स्थितस्तदा सिद्धममिश्रणमर्थानां परमार्थतः। तदुक्तम्-"द्वयोरेकाभिसम्बन्धात् सम्बन्धो यदि तद्वयोः। कः सम्बन्धोऽनवस्था चन सम्बन्धमतिस्तथा ॥" तौ च भावौ तदन्यश्च सर्वे ते खात्मनि स्थिताः । इत्यमिश्राः स्वयं भागस्तान्मिश्रयति कल्पना ॥" इति कथं सम्बन्धः स्खलक्षणमिष्यते । सम्बन्धिनोर थीन्तरं ततोऽनर्थान्तरस्य तु तथेष्टौ न वस्तुव्यतिरेकेण सम्बन्धोऽन्यत्र कल्पनामात्रादिति वदन्नपि न स्याद्वादिमतमबुध्यते। तद्धि भेदाभेदेकान्तपरान्मुखं न तदोषास्पदम् ।
SR No.090496
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 2
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1951
Total Pages674
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size21 MB
JainGPT.orgInstagram
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy