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________________ तत्त्वार्थचिन्तामाणः नहीं जावेगा । फिर जब कभी ठीक होगा सो गिना जावेगा। इसी प्रकार तिर्यग्गतिमें श्वासके अठारहवें भागरूप असंख्याते बार क्षुद्रभवोंको ग्रहण करता हुआ क्रमसे उत्तम भोगभूमिके तीन पल्योंकी स्थितिको धारण करे, ऐसे ही मनुष्यगतिमें क्रमसे परिवर्तन करे । तथा देवगतिमें भी नारकियोंके समान परिवर्तन करे, किंतु उत्कृष्ट स्थिति यहांपर इकतीस सागरतककी समझना । क्यों कि नौ अनुदिश और पांच पंचोत्तरके निवासी देवोंका संसार अत्यल्प रह जाता है । वे अनुदिश और अनुत्तर विमानोंसे च्युत होकर कर्मभूमिके मनुष्य उत्पन्न होते हैं। उनमेंसे कोई संयमको प्राप्तकर सौधर्म और ईशान स्वर्गमें उत्पन्न होकर फिर मनुष्य भवको प्राप्त कर लेते हैं, और संयमकी आराधना कर फिर भी विजयादिकोंमें उत्पन्न हो जाते हैं, वहांसे मनुष्य भव लेकर पुनः अवश्य ही मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं, कोई दूसरे जन्ममें ही मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं । सर्वार्थसिद्धिके देव तो नियमसे एक भवतारी हैं, इन चारों गतियोंके उक्त क्रमसे किये गये परिभ्रमणको भवपरिवर्तन कहते हैं। कभी कभी कोरी शंका करनेवालोंकी बुद्धिमें ऐसे तर्क उठते हैं कि भवपरिवर्तनसे कालपरिवर्तनका और कालपरिवर्तनसे क्षेत्र परिवर्तनका समय बढा हुआ है। द्रव्य, क्षेत्र, काल,का क्रम प्रसिद्ध होरहा है । इस कारण ग्रन्थोंमें उसी क्रमसे संसारपरिभ्रमणके लक्षण लिखे हैं । देखिये, भवपरिवर्तनमें चारों गतियोंकी आयुः पूरी करनी पडती है, चारों गतियोंकी आयुःकालके चौसठ सागर और छह पल्यके समयोंसे उत्सर्पिणी और अवसर्पिणीके वीस कोटाकोटी सागरके समय बहुत अधिक होते हैं। भावार्थ-चौसठ सागर छह पल्यके जितने समय हैं, उतने बार यथाक्रम ( ठीक ठीक नम्बर ) से भवपरिवर्तनमें जन्म लेने पडते हैं और काल परिवर्तनमें वीस कोटाकोटी सागरके जितने समय हैं, उतने बार ठीक (नम्बर बार) जन्म लेने पडते हैं, अतः भवपरिवर्तनसे कालपरिवर्तन बडा है । दूसरी बात यह है कि सिद्धान्त गाथाके अनुसार कालपरिवर्तनमें जन्मके समान मरण भी यथाक्रमसे विवक्षित हैं । अतः वीस कोटाकोटीके समयोंकी संख्यावार मरण करना भी गिना जावेगा यों कालपरिवर्तनका समय वैसे ही दूना हो गया । तीसरी बात यह है कि छोटे समुदायका क्रम बडे समुदायक्रमसे. अतिशीघ्र आ जाता है । कहां चौसठ सागर छह पल्यका व्यवधान और कहां वीस कोटाकोटी सागरके बाद क्रम आना यह बहुत बड़ा है। इसी प्रकार काल परिवर्तनसे क्षेत्र परिवर्तनका समय भी अधिक प्रतीत होता है । क्योंकि काल परिवर्तनमें केवल वीस कोटाकोटी सागरके जितने समय हैं, उतने बार जन्म मरण धारण करने पड़ते हैं, और क्षेत्रपरिवर्तनमें तीनों लोकोंमें जितने प्रदेश हैं उतने बार जन्म लेने पडते हैं । सूच्यंगुलके असंख्यातवे भागमें जितने आकाशके प्रदेश हैं वे असंख्यात उत्सर्पिणी और अवसर्पिणीके समयोंसे कहीं असंख्यात गुणो अधिक हैं । सूच्यंगुलसे असंख्यात गुणा प्रतरांगुल है। तथा प्रतरांगुलसे घनांगुल, श्रेणी, जगत्प्रतर, और लोक ये उत्तरोत्तर असंख्यात असंख्यात गुणे हैं । कहां केवल सूच्यङ्गुलके असंख्यातवे भागरूप वीस कोटाकोटि सागरका व्यवधान और कहां लोकका व्यवधान, बडा भारी अन्तर है । तथा सम्भव है इससे भी द्रव्यपरिवर्तन बडा होवे । क्योंकि
SR No.090496
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 2
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1951
Total Pages674
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size21 MB
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