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________________ तत्त्वार्थचिन्तामणिः ३१ द्रव्यक्षेत्रकालभवभावपरिवर्तनरूपात् संसाराद्भीरुता संवेगः । . 1 1 नोकवर्गणा और कार्माणवर्गणाओंका उतनी ही संख्या में पुनः उन्हींका आत्मासे बन्ध होनेके अन्तरालकालतक संसार में परिभ्रमण करना एक द्रव्यपरिवर्तन है । भावार्थ:-- जिनके यहां हजारों रुपयोंका आना जाना बना रहता है उनकी दुकानपर आजके नियत वे के वे ही रुपये आ जावेंगे । किन्तु लाखों वर्ष लगेंगे, मुद्रापरिवर्तन और मुद्राओंकी पूर्ण संख्या मालुम हो जाने पर गणित के अनुसार लाखों वर्षोकी ठीक संख्या भी निकाली जा सकती है । तैसे ही अतीन्द्रियदर्शी सर्वज्ञदेवने अनन्त जीव और पुद्गलोंकी ठीक संख्याको जानकर घूमते हुए चक्र में पुनः उन्हीं के दुबारा सन्मुख आनेकी मर्यादा बतला दी है । उतने कालको हम द्रव्यपरिवर्तन कहते हैं । केवलीको उस कालका हथेली के समान प्रत्यक्ष है । सुमेरुपर्वतके ठीक बीच जडमें जो आकाशके आठ प्रदेश हैं, वे ही सम्पूर्ण अलोकाकाश या लोकाकाशके ठीक बीचले प्रदेश हैं । वे आत्माकी सबसे छोटी अबगाहना घनाङ्गुलके असंख्यातवें भागरूप असंख्यातप्रदेशवाली है । इससे कम नहीं । अतः उन आठ प्रदेशोंको अपने शरीर के बीचमें देकर घनाङ्गुलके असंख्यातवें भाग सूक्ष्म अवगाहना प्रदेशोंकी संख्या बरोबर असंख्यात बार शरीरोंको धारण करता हुआ जन्म लेवें । उसके अनंतर एक एक प्रदेशको अधिक बढाता हुआ सम्पूर्ण लोकको अपना जन्मक्षेत्र बना लेवें । तकके संसारपरिभ्रमणको क्षेत्रपरिवर्तन कहते हैं । यदि एक प्रदेश भी आगे पीछे जन्म होजावेगा तो वह नहीं संभाला जावेगा, जिस नियत एक प्रदेशकी अधिकतासे जन्म लेनेका यथाक्रम आरहा है उसी क्रमसे जन्म चाहिये । लोकाकाशके जितने प्रदेश हैं, उतनी बार कठिन यथाक्रमको पूरा करना है । अतः घनाङ्गुलके असंख्यातवें भाग बार तक सूक्ष्म अवगाहनासे ही जन्म लिया जावेगा, एक एक यथाक्रमके आनेमें असंख्याते जन्म हो जावेंगे, उनकी लोकरीत्या गणना नहीं की जाती है। उत्सर्पिणीके पहिले समय में उत्पन्न होकर कोई जीव अपनी आयुको भोगकर मर गया, फिर अनेक भवोंको भोगकर उत्सर्पिणीके दूसरे समय में उत्पन्न हुआ । यदि पहिले और तीसरे समय में उत्पन्न होगा तो यह यथाक्रम ( नम्बर ) हाथसे निकल जावेगा । यों ठीक क्रमके अनुसार उत्सर्पिणी और अब - सर्पिणी के सम्पूर्ण समयोंके जन्मकी निरन्तरता और मरणकी निरन्तरतासे निकालते हुए जितने कालतक भवभ्रमण होता है उसको कालपरिवर्तन कहते हैं । एक एक यथाक्रमके मध्य में हुए असंख्याते इधर उधर समयोंके जन्म मरणोंकी गणना नहीं होती है । क्रमप्राप्त ठीक समयके जन्म मरणोंको संभालकर ही कल्पकालको पूरा करना है । इसमें असंख्याते कल्पकाल बीचमें लग जाते हैं, अनन्त भी लग जाते हैं, किन्तु यह बात अलीक नहीं, सत्य है । अनादिसे अनन्ततक काल बहुत लम्बा है । नरकगतिमें दशसहस्र वर्षकी जघन्य आयुके जितने समय हैं उतनी बार प्रथम नरक में जघन्य आयुसे जन्म लेवे और क्रमसे एक एक समय बढाता हुआ तेतीस सागरपर्यंत स्थितिको सातों नरकों में पूर्ण कर देवे, यथाक्रममें आये हुए से एक समय भी कमती बढती होगा तो वह संभाला
SR No.090496
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 2
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1951
Total Pages674
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size21 MB
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